सबसे अफ़ज़ल ज़िक्र: सुब्हानल्लाह, अल्हम्दुलिल्लाह, ला इलाहा इल्लल्लाह

बड़े सवाब वाले छोटे अज़कार, दिन के किसी भी वक़्त के लिए।

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لَا إِلَهَ إِلَّا اللَّهُ

अनुवाद और हवाला

जाबिर बिन अब्दुल्लाह रज़ियल्लाहु अनहुमा का वर्णन है, वह कहते हैं कि मैं ने अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम को यह फरमाते हुए सुना : "सबसे उत्तम ज़िक्र 'ला इलाहा इल्लल्लाह' और सबसे उत्तम दुआ 'अल-हम्दु लिल्लाह' है।"

इसे तिर्मिज़ी ने तथा नसई ने अल-सुनन अल-कुबरा में एवं इब्न-ए-माजह ने रिवायत किया है दर्जा: ह़सन

शरह

अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम बता रहे हैं कि सबसे उत्तम ज़िक्र "ला इलाहा इल्लल्लाह" है, जिसका अर्थ है, अल्लाह के सिवा कोई सत्य पूज्य नहीं है। जबकि सबसे उत्तम दुआ "अल-हम्दु लिल्लाह" है, जो इस बात का एतराफ़ है कि सारी नेमतें (अनुग्रह) प्रदान करने वाला अल्लाह है, जो संपूर्ण सुंदर गुणगान का हक़दार है।

फ़ायदे

  • कलिमा-ए-तौहीद के द्वारा अधिक से अधिक अल्लाह का ज़िक्र और अल्लाह की प्रशंसा के द्वारा अधिक से अधिक उससे दुआ करने की प्रेरणा।

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سُبْحَانَ اللَّهِ، وَالْحَمْدُ لِلَّهِ، وَلَا إِلَهَ إِلَّا اللَّهُ، وَاللَّهُ أَكْبَرُ

अनुवाद और हवाला

समुरा बिन जुनदुब रज़ियल्लाहु अनहु का वर्णन है, उन्होंने कहा : अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया है : “अल्लाह के निकट सबसे प्रिय वाक्य चार हैं : सुबहान अल्लाह (अल्लाह पाक है), अल-हम्दु लिल्लाह (समस्त प्रकार की प्रशंसा अल्लाह ही के लिए हैं), ला इलाहा इल्लल्लाह (अल्लाह के अतिरिक्त कोई सच्चा पूज्य नहीं है) और अल्लाहु अकबर (अल्लाह सबसे बड़ा है)। इनमें से जिस से चाहो आरंभ करो, हानि की कोई बात नहीं है ”

इसे मुस्लिम ने रिवायत किया है दर्जा: स़ह़ीह़

शरह

अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम बता रहे हैं कि अल्लाह के निकट सबसे प्रिय वाक्य चार हैं :

सुबहान अल्लाह : इसका अर्थ है अल्लाह को हर कमी से पवित्र घोषित करना।

अल-हम्दु लिल्लाह : इसका मतलब है अल्लाह को हर एतबार से संपूर्ण बताना, उससे प्रेम रखना और उसका सम्मान करना।

ला इलाहा इल्लल्लाह : इसका अर्थ यह है कि अल्लाह के अतिरिक्त कोई सच्चा पूज्य नहीं है।

अल्लाहु अकबर : अल्लाह सबसे शक्तिशाली, सबसे महान और सबसे सामर्थ्यवान है।

इन वाक्यों की फ़ज़ीलत तथा इनके सवाब की प्राप्ति के लिए इनको हदीस में उल्लिखित कर्म के अनुसार कहना अनिवार्य नहीं है।

फ़ायदे

  • इस्लामी शरीयत एक आसान शरीयत है। यही कारण है कि इस बात की अनुमति दी गई है कि इन चार शब्दों में से जिससे चाहें आरंभ कर सकते हैं।

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سُبْحَانَ اللَّهِ وَبِحَمْدِهِ، سُبْحَانَ اللَّهِ الْعَظِيمِ

अनुवाद और हवाला

अबू हुरैरा रज़ियल्लाहु अनहु का वर्णन है कि अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया है : दो शब्द रहमान (अल्लाह) को बड़े प्रिय हैं, ज़ुबान पर बड़े हलके हैं और तराज़ू में बड़े भारी होंगे : सुबहानल्लाहिल अज़ीम, सुबहानल्लाहि व बिहम्दिहि (अल्लाह पाक है अपनी प्रशंसा समेत, पाक है अल्लाह जो बड़ा महान है)।”

इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया है दर्जा: स़ह़ीह़

शरह

अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने बताया है कि दो वाक्य हैं, जिनको इन्सान आसानी के साथ किसी भी हाल में बोल सकता है, तराज़ू में इनका प्रतिफल बहुत भारी साबित होगा और हमारा रब इन दोनों वाक्यों से मोहब्बत रखता है। यह दोनों वाक्य हैं :

सुबहानल्लाहिल अज़ीम, सुबहानल्लाहि व बिहम्दिहि (पाक है अल्लाह जो बड़ा महान है, अल्लाह पाक है अपनी प्रशंसा समेत)। इन दोनों वाक्यों का इतना महत्व इसलिए है कि इनके अंदर अल्लाह की महिमा और संपूर्णता बयान की गई है और उसे तमाम कमियों से पाक घोषित किया गया है।

फ़ायदे

  • सबसे बड़ा ज़िक्र वह है, जिसके अंदर अल्लाह की पाकी बयान की जाए और उसकी प्रशंसा की जाए।
  • बंदों पर अल्लाह का व्यापक अनुग्रह कि वह छोटे-छोटे कार्य पर भी बड़े-बड़े बदले दे दिया करता है।

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سُبْحَانَ اللَّهِ، وَالْحَمْدُ لِلَّهِ، وَلَا إِلَهَ إِلَّا اللَّهُ، وَاللَّهُ أَكْبَرُ

अनुवाद और हवाला

अबू हुरैरा रज़ियल्लाहु अनहु से वर्णित है, उन्होंने कहा : अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया : "सुबहानल्लाह, अल-हम्दु लिल्लाह, ला इलाहा इल्लल्लाह और अल्लाहु अकबर कहना, मेरे निकट उन सारी चाज़ों की तुलना में अधिक उत्तम है, जिनपर सूरज निकलता है।"

इसे मुस्लिम ने रिवायत किया है दर्जा: स़ह़ीह़

शरह

अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम बता रहे हैं कि इन महत्वपूर्ण शब्दों द्वारा अल्लाह का ज़िक्र करना दुनिया और उसकी सारी चीज़ों से बेहतर है। ये शब्द इस प्रकार हैं :

"सुबहानल्लाह" : इन शब्दों द्वारा तमाम कमियों से अल्लाह की पाकी बयान की जाती है।

"अल-हम्दु लिल्लाह" : अल्लाह की यह प्रशंसा कि वह अपने सारे गुणों में संपूर्ण है। साथ में उससे मोहब्बत तथा उसका सम्मान भी हो।

"ला इलाहा इल्लल्लाह" : अल्लाह के सिवा कोई सच्चा पूज्य नहीं है।

"अल्लाहु अकबर" : अल्लाह हर चीज़ से बड़ा तथा शक्तिशाली है।

फ़ायदे

  • अल्लाह के ज़िक्र की प्रेरणा और इस बात का उल्लेख कि अल्लाह का ज़िक्र उन सभी चीज़ों से प्रिय है, जिनपर सूरज निकलता है।
  • अधिक से अधिक ज़िक्र करने की प्रेरणा, क्योंकि इसका बहुत बड़ा प्रतिफल है।
  • दुनिया के आनंद की चीज़ें थोड़ी हैं और सब ख़त्म हो जाएँगी।

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سُبْحَانَ اللَّهِ وَبِحَمْدِهِ

अनुवाद और हवाला

अबू हुरैरा रज़ियल्लाहु अनहु का वर्णन है कि अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया : “जिसने दिन भर में सौ बार 'सुबहानल्लाहि व बिह़म्दिहि' (अल्लाह के लिए पवित्रता है उसकी प्रशंसा के साथ) कहा, उसके सारे पाप क्षमा कर दिए जाएँगे, यद्यपि वे समुद्र के झाग के बराबर ही क्यों न हों।”

इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया है दर्जा: स़ह़ीह़

शरह

अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम बता रहे हैं कि जिसने दिन एवं रात में सौ बार 'सुबहानल्लाहि व बिह़म्दिहि' (अल्लाह के लिए पवित्रता है उसकी प्रशंसा के साथ) कहा, उसके गुनाह मिटा तथा क्षमा कर दिए जाते हैं, यद्यपि उसके गुनाह इतने अधिक हों कि समुद्र के झाग के बराबर मालूम होते हों।

फ़ायदे

  • यह सवाब लगातार तथा अंतराल के साथ दोनों तरह कहने से प्राप्त होगा।
  • तसबीह का मलतब है अल्लाह को सभी कमियों से पवित्र कहना और ह़म्द (प्रशंसा) का अर्थ है उसे प्रेम तथा सम्मान के साथ हर प्रकार से संपूर्ण मानना।
  • इस हदीस से मुराद छोटे गुनाहों का माफ़ होना है। बड़े गुनाह तौबा के बिना माफ़ नहीं होते।

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سُبْحَانَ اللَّهِ الْعَظِيمِ وَبِحَمْدِهِ

अनुवाद और हवाला

जाबिर -रज़ियल्लाहु अनहु- का वर्णन है कि अल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फ़रमाया है : "जिसने कहा : "मैं अल्लाह की पवित्रता बयान करता हूँ उसकी प्रशंसा के साथ", उसके लिए जन्नत में एक खजूर का पेड़ लगा दिया जाता है।"

इसे तिर्मिज़ी ने रिवायत किया है दर्जा: स़ह़ीह़

शरह

अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने बताया कि जिसने कहा :

(सुबहान अल्लाह, अर्थात, मैं अल्लाह की पाकी बयान करता हूँ) और अल्लाह की पवित्रता का गुणगान किया, (अल-अज़ीम, अर्थात : जो महान है) स्वयं तथा अपने गुणों एवं कार्यों में महान है, (वबि-हम्दिही) इस हाल में कि यह पाकीज़गी उसकी प्रशंसा के साथ जुड़ी हुई है; जब भी व्यक्ति यह कहता है तब जन्नत की ज़मीन में उसके लिए खजूर का एक पेड़ लगा दिया जाता है।

फ़ायदे

  • अधिक से अधिक अल्लाह का ज़िक्र करने की प्रेरणा। अल्लाह के ज़िक्र में "अल-हम्दु लिल्लाह" के साथ 'सुबहान अल्लाह' भी कहना हैं।
  • जन्नत एक विशाल एवं विस्तृत स्थान है और अल्लाह की पवित्रता तथा प्रशंसा गान से उसमें पेड़ लगते हैं। यह दरअसल अल्लाह का अनुग्रह एवं कृपा है।
  • यहाँ हदीस में अन्य पेड़ों की बजाय खजूर के पेड़ का ज़िक्र इसलिए किया गया है कि यह एक बहुत ही लाभकारी पेड़ है और इसका फल बहुत अच्छा होता है। यही कारण है कि अल्लाह ने कुरान में मोमिन और उसके ईमान की मिसाल इसी पेड़ से दी है।

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لَا إِلَهَ إِلَّا اللهُ وَحْدَهُ لَا شَرِيكَ لَهُ، اللهُ أَكْبَرُ كَبِيرًا، وَالْحَمْدُ لِلَّهِ كَثِيرًا، سُبْحَانَ اللهِ رَبِّ الْعَالَمِينَ، لَا حَوْلَ وَلَا قُوَّةَ إِلَّا بِاللهِ الْعَزِيزِ الْحَكِيمِ

अनुवाद और हवाला

साद रज़ियल्लाहु अनहु का वर्णन है, वह कहते हैं : एक देहाती, अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के पास आया और बोला : मुझे कोई ऐसी बात सिखा दीजिए, जो मैं कहता रहूँ। आपने फ़रमाया : तुम कहते रहा करो : لا إله إلا الله وحده لا شريك له، الله أكبر كبيرًا، والحمد لله كثيرًا، وسبحان الله رب العالمين، ولا حول ولا قوة إلا بالله العزيز الحكيم" (अर्थात, अल्लाह के अतिरिक्त कोई वास्तविक पूज्य नहीं है। वह अकेला है। उसका कोई साझी नहीं है। अल्लाह सबसे बड़ा है। उस अल्लाह के लिए अत्याधिक प्रशंसा है। पवित्र है वह अल्लाह, जो सारे जहानों का रब है। पाप से दूर रहने की शक्ति एवं नेकी का सामर्थ्य केवल उसी शक्तिशाली एवं हिकमत वाले अल्लाह से प्राप्त होती है।) उसने कहा : यह शब्द तो मेरे रब के लिए हैं, मेरे लिए क्या है? आपने फ़रमाया : तुम कहा करो : اللهم اغفر لي وارحمني واهدني وارزقني" (अर्थात, ऐ अल्लाह! मुझे क्षमा कर दे, मुझपर दया कर, मुझे सीधा रास्ता दिखा और मुझे रोज़ी प्रदान कर।)

इसे मुस्लिम ने रिवायत किया है दर्जा: स़ह़ीह़

शरह

देहात से आए हुए एक व्यक्ति ने अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम से अनुरोध किया कि उसे एक ज़िक्र सिखा दें, जिसे वह पढ़ा करे। अतः अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने उससे कहा : तुम कहा करो : "لا إله إلا الله وحده لا شريك له" आरंभ एकेश्वरवाद की गवाही से किया। इसका अर्थ यह है कि अल्लाह के अतिरिक्त कोई सच्चा पूज्य नहीं है। "الله أكبر كبيرًا" (अल्लाहु अकबर कबीरा) यानी अल्लाह सारी चीज़ों से बड़ा एवं महान है। "والحمد لله كثيرًا" (वल-हम्दु लिल्लाहि कसीरा) यानी अल्लाह की अत्यधिक प्रशंसा है। उसके गुणों एवं कार्यों तथा अनगिनत नेमतों पर। "سبحان الله رب العالمين" (सुबहानल्लाहि रब्बिल आलमीन) यानी अल्लाह कमियों से पाक एवं पवित्र है। "لا حول ولا قوة إلا بالله العزيز الحكيم" (ला हौला व ला क़ुव्वता इल्ला बिल्लाहिल अलिय्यिल अज़ीम) यानी एक अवस्था से दूसरी अवस्था में जाना अल्लाह, उसके सहयोग और सुयोग के बिना संभव नहीं है। उस व्यक्ति ने कहा : ये शब्द मेरे रब के लिए हैं। यानी उसके ज़िक्र एवं सम्मान के लिए हैं। मुझे खुद अपने लिए माँगना हो, तो किन शब्दों द्वारा माँगूँ? चुनांचे अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने उनसे कहा : तुम कहो : "اللهم اغفر لي" (अल्लाहुम्मग़्फिरली) ऐ अल्लाह! मेरे गुनाहों को मिटाकर तथा उनपर पर्दा डालकर मुझे क्षमा कर दे। "وارحمني" (वर्हमनी) मेरे धार्मिक एवं सांसारिक हितों की रक्षा करते हुए, मुझपर दया करत। "واهدني" (वहदिनी) मुझे उत्तम परिस्थितियों की राह दिखा और सीधे मार्ग पर चला। "وارزقني" (वर्ज़ुक़नी) मुझे हलाल धन, स्वास्थ्य और हर भलाई एवं सुरक्षा प्रदान कर।

फ़ायदे

  • ला इलाहा इल्लल्लाह, अल्लाहु अकबर, अल-हम्दु लिल्लाह और सुबहानल्लाह द्वारा अल्लाह का ज़िक्र करने की प्रेरणा।
  • दुआ करने से पहले अल्लाह का ज़िक्र और प्रशंसा करना मुसतहब है।
  • मुसतहब यह है कि इन्सान बेहतरीन दुआओं द्वारा अल्लाह से दुआ माँगे। अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम से वर्णित ऐसी सारगर्भित दुआओं का चयन करे, जो अपने अंदर दुनिया एवं आख़िरत की भलाइयाँ समेटी हुई हों। इन्सान को अख़्तियार है कि वह जो दुआ चाहे, करे।
  • बंदे को ऐसी चीज़ें सीखने की कोशिश करनी चाहिए, जो दुनिया एवं आख़िरत में उसके हक़ में लाभकारी हों।
  • क्षमा, दया एवं आजीविका माँगने की प्रेरणा, क्योंकि इन्हीं चीज़ों से भलाई के स्रोत फूटते हैं।
  • अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की यह कोशिश कि उम्मत को ऐसी बातें सिखाई जाएँ, जो उसके हक़ में लाभकारी हों।
  • दया का ज़िक्र क्षमा के बाद इसलिए हुआ है कि इन्सान पूरे तौर पर स्वच्छ हो जाए। क्योंकि "المغفرة" (अल-मग़्फ़िरह) गुनाहों पर पर्दा डाल देने, उनको मिटा देने और जहन्नम से बचा लेने का नाम है, जबकि दया विभिन्न प्रकार की भलाई प्रदान करने और जन्नत में दाख़िल करने का नाम है और यही सबसे बड़ी सफलता है।

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يَا ذَا الْجَلَالِ وَالْإِكْرَامِ

अनुवाद और हवाला

अनस बिन मालिक- रज़ियल्लाहु अंहु) कहते हैं कि अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फ़रमायाः "यह दुआ सदा पढ़ते रहा करो 'يَاذا الجَلاَلِ والإكْرامِ' (अर्थात, ऐ प्रतापी एवं उपकारी)।"

इसे तिर्मिज़ी ने रिवायत किया है। - इसे नसाई ने रिवायत किया है। - इसे अह़मद ने रिवायत किया है। दर्जा: सह़ीह़

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अनुवाद और हवाला

अबू सईद ख़ुदरी तथा अबू हुरैरा (रज़ियल्लाहु अनहुमा) ने अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) को साक्षी ठहराते हुए कहा कि आपने फ़रमायाः जो (لا إله إلا الله والله أكبر) कहता है तो अल्लाह कहता हैः मेरे सिवा कोई सत्य़ पूज्य नहीं और मैं ही सबसे महान हूँ) और जब (لا إله إلا الله وحده لا شريك له) कहता है, तो कहता हैः मेरे सिवा कोई पूज्य नहीं और मेरा साझी भी कोई नहीं। और जब (لا إله إلا الله له الملك وله الحمد) कहता है, तो अल्लाह कहता हैः मेरे सिवा कोई सत्य़ पूज्य नहीं और मेरी ही बादशाहत है तथा सारी प्रशंसा भी मेरे लिए है और जब لا إله إلا الله ولا حول ولا قوة إلا بالله कहता है, तो अल्लाह कहता हैः मेरे सिवा कोई सत्य़ पूज्य नहीं और मेरी अनुमति के बिना कोई क्षमता और ताक़त भी नहीं। आप कहा करते थे किः जो रोगग्रस्त हालत में कह कर मरता है, उसे आग जला नहीं सकती।

इसे इब्ने माजा ने रिवायत किया है । - इसे तिर्मिज़ी ने रिवायत किया है। दर्जा: सह़ीह़

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अनुवाद और हवाला

अबू सईद ख़ुदरी (रज़ियल्लाहु अन्हु) का वर्णन है कि अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने फ़रमायाः “शेष रहने वाली नेक चीज़ें हैंः ला इलाहा इल्लल्लाह (अल्लाह के सिवा कोई सच्चा पूज्य नहीं है), सुबहान अल्लाह (अल्लाह पाक है), अल्लाहु अकबर (अल्लाह सबसे बड़ा है) अल-हम्दुलिल्लाह (समस्त प्रकार की प्रशंसा अल्लाह ही के लिए है) तथा ला ह़ौला व ला क़ुव्वता इल्ला बिल्लाह (अल्लाह की मदद बिना न हालात बदलने की ताक़त है और न कुछ करने का साहस)।”

इसे इब्ने ह़िब्बान ने रिवायत किया है । - इसे ह़ाकिम ने रिवायत किया है। - इसे नसाई ने रिवायत किया है। दर्जा: शवाहिद के आधार पर सह़ीह़

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अनुवाद और हवाला

अबू मालिक अशअरी रज़ियल्लाहु अनहु से रिवायत है, वह कहते हैं कि अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फ़रमाया : "पवित्रता आधा ईमान है, अल-हम्दु लिल्लाह तराज़ू को भर देता है, सुबहानल्लाह और अल-हम्दु लिल्लाह दोनों मिलकर आकाश एवं धरती के बीच के खाली स्थान को भर देते हैं, नमाज़ नूर है, सदक़ा प्रमाण है, धैर्य प्रकाश है और क़ुरआन तुम्हारे लिए या तुम्हारे विरुद्ध प्रमाण है। प्रत्येक व्यक्ति जब रोज़ी की खोज में सुबह निकलता है, तो अपने नफ़्स को बेचता है। चुनांचे वह उसे आज़ाद करता है या उसका विनाश करता है।"

इसे मुस्लिम ने रिवायत किया है दर्जा: स़ह़ीह़

शरह

अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम बता रहे हैं कि ज़ाहिरी शरीर की तहारत (पवित्रता) वज़ू एवं ग़ुस्ल (स्नान) के द्वारा प्राप्त होती है। तहारत नमाज़ की एक शर्त है। अल-हम्दु लिल्लाह, जो कि अल्लाह की प्रशंसा करना और उसे संपूर्णता पर आधारित गुणों से परिपूर्ण मानना है, इसे कहना क़यामत के दिन वज़न किया जाएगा और यह कर्मों के तराज़ू को भर देगा। सुबहानल्लाह तथा अल-हम्दु लिल्लाह, जो कि दरअसल अल्लाह को हर कमी से पवित्र घोषित करना और उसे संपूर्णता के ऐसे गुणों से परिपूर्ण मानना है, जो उसके प्रताप के अनुरूप हैं, इन दोनों वाक्यों को कहना और साथ में अल्लाह से प्रेम तथा उसका सम्मान करना, आकाशों एवं ज़मीन के बीच के स्थान को भर देता है। नमाज़ बंदे के लिए नूर है, जो उसके दिल में मौजूद रहता है, उसके चेहरे पर प्रकट होता है, उसकी क़ब्र को रौशन रखता है और दोबारा जीवित होकर उठते समय उसका साथ देगा। सदक़ा बंदे के सच्चे मोमिन होने का प्रमाण है, और उसके मुनाफ़िक़ से अलग होने का प्रमाण है, जो सदक़ा के प्रतिफल पर विश्वास न होने के कारण सदक़ा नहीं करता। सब्र (धैर्य) प्रकाश है। सब्र, अधीर होने और नाराज़ होने से बचने का नाम है। नूर ऐसे प्रकाश को कहते हैं, जिसमें गर्मी और जलाने की विशेषता होती है। जैसे सूरज का प्रकाश। सब्र को नूर इसलिए कहा गया है कि सब्र करना एक कठिन कार्य है और इसके लिए नफ़्स से लड़ने और उसे उसकी पसंद से रोकने की ज़रूरत होती है। सब्र करने वाला इन्सान हमेशा सच्चाई के आलोकित मार्ग पर चलता रहता है। यहाँ सब्र से मुराद उसके तीनों प्रकार यानी अल्लाह के आज्ञापालन पर डटे रहना, उसकी अवज्ञा से बचते रहना और मुसीबतों तथा दुनिया के हादसों (दुर्घटनाओं) का धैर्य के साथ मुक़ाबला करना है। क़ुरआन की तिलावत और उसमें लिखी हुई बातों का अनुपालन तुम्हारे लिए दलील है। जबकि क़ुरआन पर अमल न करना या उसकी तिलावत न करना तुम्हारे विरुद्ध दलील है। फिर अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने बताया कि सारे लोग जब नींद से जागते हैं, विभिन्न कार्यों के लिए अपने घरों निकल पड़ते हैं। ऐसे में कुछ लोग अल्लाह की आज्ञाओं का पालन करके खुद को आग से आज़ाद कर लेते हैं। जबकि कुछ लोग इससे विचलित हो जाते हैं, गुनाहों में पड़ जाते हैं और आग में प्रवेश करने का सामान करके खुद को विनष्ट कर लेते हैं।

फ़ायदे

  • तहारत के दो प्रकार हैं। एक ज़ाहिरी (प्रत्यक्ष) तहारत, जो वज़ू एवं स्नान से प्राप्त होती है और दूसरा बातिनी (परोक्ष) तहारत, जो तौहीद (एकेश्वरवाद), ईमान और अच्छे कर्म से प्राप्त होती है।
  • नमाज़ की पाबंदी करने का महत्व। क्योंकि नमाज़ बंदे के लिए दुनिया में तथा क़यामत के दिन प्रकाश है।
  • सदक़ा सच्चे ईमान का प्रमाण है।
  • क़ुरआन पर अमल करने और उसे सच्ची किताब मानने का महत्व। इससे क़ुरआन इन्सान के पक्ष में प्रमाण बन जाता है। उसके विरुद्ध नहीं।
  • नफ़्स (आत्मा, मन) अगर अल्लाह के आज्ञापालन में न लगाया जाए, वह इन्सान को अल्लाह की अवज्ञा में लगा देता है।
  • हर इन्सान कोई न कोई काम ज़रूर करता है। काम चाहे अल्लाह को राज़ी करने वाला हो, जो उसे जहन्नम से मुक्ति प्रदान करता है या उसे नाराज़ करने वाला, जो उसका विनाश कर देता है।
  • सब्र के लिए सहन शक्ति तथा आत्म मूल्यांकन की ज़रूरत होती है, जो कि एक कठिन कार्य है।

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अनुवाद और हवाला

अब्दुल्लाह बिन मसऊद रज़ियल्लाहु अन्हु से वर्णित है, वह कहते हैं कि अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फरमाया : "जिस रात मुझे मेराज कराई गई, उस रात मैं इब्राहीम अलैहिस्सलाम से मिला। तो इब्राहीम अलैहिस्सलाम ने मुझसे कहा : ऐ मुहम्मद! अपनी उम्मत को मेरा सलाम कहना और बता देना कि जन्नत की मिट्टी बड़ी अच्छी है और उसका पानी बड़ा मीठा है। जन्नत एक चटियल मैदान है और उसमें पेड़ लगाने का काम "सुबहान अल्लाह, अल-हम्दु लिल्लाह, ला इलाहा इल्लल्लाह एवं अल्लाहु अकबर" द्वारा होता है।"

इसे तिर्मिज़ी ने रिवायत किया है दर्जा: शवाहिद के आधार पर ह़सन

शरह

अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम बता रहे हैं कि इस्रा एवं मेराज की रात आपकी मुलाक़ात अल्लाह के परम मित्र इब्राहीम अलैहिस्सलाम से हुई, तो उन्होंने कहा : ऐ मुहम्मद! अपनी उम्मत को मेरा सलाम कह देना और बता देना कि जन्नत की मिट्टी बहुत अच्छी है और उसका पानी बड़ा मीठा है। खारेपन का नाम व निशान तक नहीं है। जन्नत एक समतल, पेड़-पौधों से ख़ाली और बहुत बड़ा मैदान है, जिसमें पेड़ लगाने का काम कुछ पवित्र शब्दों द्वारा होता है। इन पवित्र शब्दों को "अल-बाक़ियात अल-सालिहात" यानी बाक़ी रह जानी वाली नेकियाँ भी कहा जाता है। ये शब्द हैं : "सुबहानल्लाह, अल-हम्दु लिल्लाह, ला इलाहा इल्लल्लाह एवं अल्लाहु अकबर", जब जब कोई मुसलमान इन शब्दों को कहता है और दुहराता है, तो उसके लिए जन्नत में पेड़ लगा दिया जाता है।

फ़ायदे

  • जन्नत में अधिक से अधिक पेड़ लगें, इसके लिए अल्लाह का ज़िक्र करने की प्रेरणा।
  • इस्लामी उम्मत की यह फ़ज़ीलत कि इब्राहीम अलैहिस्सलाम ने उसे सलाम पहुँचाया।
  • इब्राहीम अलैहिस्सलाम ने उम्मत-ए-मुहम्मदी को अधिक से अधिक अल्लाह का ज़िक्र करने की प्रेरणा दी है।
  • तीबी कहते हैं : जन्नत एक चटियल मैदान है। उसमें अल्लाह अपने अनुग्रह से बंदों के कर्मों के अनुसार पेड़ों एवं महलों की व्यवस्था कर देता है। हर बंदे को यह दोनों चीज़ें उसके कर्म के अनुसार मिलेंगी। वैसे, अल्लाह हर बंदे को उन कार्यों का सुयोग प्रदान करता है, जिनके लिए उसे पैदा किया गया है, ताकि वह कर्मों का प्रतिफल पेड़ लगाने वाले की तरह प्राप्त कर सके।

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अनुवाद और हवाला

अबू हुरैरा -रज़ियल्लाहु अनहु- का वर्णन है कि अल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फ़रमाया है : "जो लोग किसी सभा में बैठते हैं और वहाँ अल्लाह को याद नहीं करते तथा अपने नबी पर दरूद नहीं भेजते, तो उनका वह बैठना उनके लिए पछतावे का कारण बनेगा। अब यदि अल्लाह चाहेगा, तो उन्हें यातना देगा और चाहेगा तो माफ़ करेगा।"

इसे अबू दावूद ने, तिर्मिज़ी ने तथा नसई ने अल-सुनन अल-कुबरा में रिवायत किया है दर्जा: स़ह़ीह़

शरह

अल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने अल्लाह के ज़िक्र में कोताही करने से मना किया है और बताया है कि जब लोग किसी सभा में बैठे और फिर वहाँ से अल्लाह का ज़िक्र किए और उसके रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- पर दरूद भेजे बिना उठ गए, तो वह सभा क़यामत के दिन उनके लिए खेद, अफ़सोस, हानि और नुक़सान का कारण बनेगी। ऐसे में अगर अल्लाह चाहेगा, तो उनको उनके पिछले गुनाहों और बाद में होने वाली कोताहियों के कारण अज़ाब देगा और अगर चाहेगा तो अपने अनुग्रह से क्षमा कर देगा।

फ़ायदे

  • ज़िक्र की प्रेरणा और उसकी फ़ज़ीलत का बयान।
  • ऐसी सभाओं की फ़ज़ीलत, जिनमें अल्लाह का ज़िक्र और उसके रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम का ज़िक्र किया जाए। जो सभाएँ इन दोनों बातों से ख़ाली हों, वह क़यामत के दिन वहाँ बैठने वालों के लिए हानिकारक सिद्ध होंगी।
  • अल्लाह के ज़िक्र को नज़रअंदाज़ करने के ख़िलाफ़ चेतावनी सिर्फ़ सभाओं तक ही सीमित नहीं है, बल्कि दूसरी जगहों पर भी लागू होती है। इमाम नववी (अल्लाह उन पर रहम करे) ने कहा है : किसी व्यक्ति के लिए किसी जगह पर बैठकर अल्लाह का ज़िक्र किए बिना उसे छोड़ देना नापसंद है।
  • क़यामत के दिन उन्हें जो पछतावा होगा वह या तो अल्लाह की आज्ञाकारिता में अपना समय न बिताने के कारण पुरस्कार और प्रतिफल से वंचित रहने के कारण होगा, या अल्लाह की अवज्ञा में अपना समय बर्बाद करने के कारण पाप और दंड की वजह से होगा।
  • जब जायज़ कार्यों में व्यस्त होकर अल्लाह के ज़िक्र का अनदेखा करने वालों के लिए यह चेतावनी है, तो उन हराम सभाओं का क्या हाल होगा, जिनमें ग़ीबत और चुग़ली आदि होती है।

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सवाल

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