नमाज़ की दुआएं: सना, रुकू, सजदा और तशह्हुद

वे दुआएं जो नबी करीम ﷺ नमाज़ में तकबीर-ए-तहरीमा से सलाम तक पढ़ते थे।

1 एक बार

اللهُمَّ بَاعِدْ بَيْنِي وَبَيْنَ خَطَايَايَ كَمَا بَاعَدْتَ بَيْنَ الْمَشْرِقِ وَالْمَغْرِبِ، اللهُمَّ نَقِّنِي مِنْ خَطَايَايَ كَمَا يُنَقَّى الثَّوْبُ الْأَبْيَضُ مِنَ الدَّنَسِ، اللهُمَّ اغْسِلْنِي مِنْ خَطَايَايَ بِالثَّلْجِ وَالْمَاءِ وَالْبَرَدِ

अनुवाद और हवाला

अबू हुरैरा रज़ियल्लाहु अनहु का वर्णन है, वह कहते हैं : अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम जब नमाज़ की तकबीर कहते, तो (सूरा फ़ातिहा) पढ़ने से पहले कुछ देर ख़ामोश रहते। सो, मैंने कहा : ऐ अल्लाह के रसूल, आपपर मेरे माँ-बाप फ़िदा हों, आप तकबीर और (सूरा फ़ातिहा) पढ़ने के बीच जो खामोश रहते हैं, उसमें क्या पढ़ते हैं? फ़रमाया : मैं कहता हूँ : ऐ अल्लाह, मेरे तथा मेरे गुनाहों के बीच उतनी दूरी पैदा कर दे, जितनी दूरी पूरब और पश्चिम के बीच रखी है। ऐ अल्लाह, मुझे गुनाहों से साफ़ कर दे, जैसे उजले कपड़े को मैल-कुचैल से साफ़ किया जाता है। ऐ अल्लाह, मुझे मेरे गुनाहों से पानी, बर्फ और ओले से धो दे।"

इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया है दर्जा: स़ह़ीह़

शरह

अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम जब नमाज़ की तकबीर कहते, तो सूरा फ़ातिहा पढ़ने से पहले ज़रा देर रुकते। इस अंतराल में कुछ दुआओं द्वारा नमाज़ क आग़ाज़ करते। उनमें से एक दुआ यह है : "ऐ अल्लाह! मेरे तथा मेरे गुनाहों के बीच उतनी दूरी पैदा कर दे, जितनी दूरी तूने पूरब और पश्चिम के बीच रखी है। ऐ अल्लाह! मुझे गुनाहों से साफ़ कर दे, जैसे उजले कपड़े को मैल-कुचैल से साफ़ किया जाता है। ऐ अल्लाह! मुझे मेरे गुनाहों से पानी, बर्फ और ओले से धो दे।" आप सर्वशक्तिमान एवं महान अल्लाह से दुआ करते कि वह आपको गुनाहों में संलिप्त होने से बचाने के लिए आपके और गुनाहों के बीच इतनी दूरी बना दे कि दोनों एक-दूसरे से मिल न सकें। जैसे कि सूरज के निकलने और डूबने के स्थान कभी आपस में मिल नहीं सकते। अगर गुनाहों में संलिप्त हो भी जाएँ, तो उनसे आपको ऐसे स्वच्छ कर दे कि जैसे सफ़ेद कपड़े से मैल-कुचैल को धोकर साफ़-सुथरा कर दिया जाता है। इसी तरह आपको पानी, बर्फ़ और ओले जैसी ठंडी चीज़ों द्वारा गुनाहों से धो दे और गुनाहों की तपिश और गर्मी को ठंडा कर दे।

फ़ायदे

  • नमाज़ के आरंभ की दुआ धीमी पढ़ी जाएगी, नमाज़ चाहे जहरी (ऊँची आवाज़ में क़िरात वाली) ही क्यों न हो।
  • सहाबा अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की एक-एक बात को जानने का प्रयास करते थे।
  • नमाज़ के आरंभ में पढ़ने की और भी दुआएँ आई हुई हैं। बेहतर यह है कि अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम से वर्णित एवं साबित सभी दुआओं को याद कर लिया जाए और कभी इसे तो कभी उसे पढ़ा जाए।

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2 एक बार

سبُّوحٌ قُدُّوسٌ رَبُّ المَلاَئِكَةِ وَالرُّوحِ

अनुवाद और हवाला

आइशा (रज़ियल्लाहु अंहा) कहती हैं कि अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) अपने रुकू और सजदे में कहा करते थेः ऐ अल्लाह! तू पवित्र एवं पाक है तथा फ़रिश्तों एवं जिबरील का रब है।

इसे मुस्लिम ने रिवायत किया है। दर्जा: सह़ीह़

3 एक बार

سَمِعَ اللهُ لِمَنْ حَمِدَهُ، اللَّهُمَّ رَبَّنَا لَكَ الْحَمْدُ، مِلْءَ السَّمَاوَاتِ وَمِلْءَ الْأَرْضِ وَمِلْءَ مَا شِئْتَ مِنْ شَيْءٍ بَعْدُ

अनुवाद और हवाला

अब्दुल्लाह बिन अबू औफ़ा रज़ियल्लाहु अनहु कहते हैं : अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम जब रुकू से पीठ उठाते, तो यह दुआ पढ़ते : "سَمِعَ اللهُ لِمَنْ حَمِدَهُ، اللَّهُمَّ رَبَّنَا لَكَ الْحَمْدُ، مِلْءَ السَّمَاوَاتِ وَمِلْءَ الْأَرْضِ وَمِلْءَ مَا شِئْتَ مِنْ شَيْءٍ بَعْدُ" (अल्लाह ने उसकी सुन ली, जिसने उसकी प्रशंसा की। ऐ अल्लाह! हमारे रब! तेरी ही प्रशंसा है आकाशों भर, ज़मीन भर और उनके बाद भी तू जो चाहे, उसके भर।)

इसे मुस्लिम ने रिवायत किया है दर्जा: स़ह़ीह़

शरह

अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम जब नमाज़ में रुकू से सर उठाते, तो फ़रमाते : ""سمع الله لِمَن حمده"" यानी जिसने अल्लाह की प्रशंसा की, अल्लाह उसकी प्रशंसा को ग्रहण करता है और उसे सवाब देता है। फिर इन शब्दों में अल्लाह की प्रशंसा करते : "" اللَّهُمَّ رَبَّنَا لَكَ الْحَمْدُ، مِلْءَ السَّمَاوَاتِ وَمِلْءَ الْأَرْضِ وَمِلْءَ مَا شِئْتَ مِنْ شَيْءٍ بَعْدُ "" यानी ऐसी प्रशंसा जो आकाशों, ज़मीनों और उनके बीच के स्थान को भर दे और उन तमाम चीज़ों को भर दे, जो अल्लाह चाहे।

फ़ायदे

  • उस ज़िक्र का बयान जो रुकू से सर उठाते समय कहना मुसतहब है।
  • रुकू से उठने के बाद पूरे इत्मीनान (शांति एवं स्थिरता) के साथ सीधा खड़ा होना ज़रूरी है। क्योंकि इस पूरे ज़िक्र को उसी समय पढ़ना संभव है, जब आदमी पूरे इत्मीनान के साथ खड़ा हो।
  • इस ज़िक्र को हर नमाज़ में पढ़ना शरीयत सम्मत है। नमाज़ चाहे फ़र्ज़ हो या नफ़ल।

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4 एक बार

اللَّهمَّ اغْفِرْ لي، وارْحَمْنِي، وعافِني، واهْدِني، وارزقْنِي

अनुवाद और हवाला

अब्दुल्लाह बिन अब्बास रज़ियल्लाहु अनहुमा से रिवायत है कि अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम दो सजदों के बीच में यह दुआ पढ़ते थे : "ऐ अल्लाह! तू मुझे माफ कर दे, मेरे ऊपर रहम कर, मुझे आफियत (स्वास्थ्य इत्यादि) दे तथा मुझे रोज़ी प्रदान कर।"

इस ह़दीस़ को अबू दावूद, तिर्मिज़ी, इब्न-ए-माजह और अह़मद ने रिवायत किया है दर्जा: शवाहिद के आधार पर ह़सन

शरह

अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम नमाज़ में यह पाँच चीज़ें माँगा करते थे, जिनकी एक मुसलमान को बड़ी ज़रूरत होती है और जिनके अंदर दुनिया एवं आख़िरत दोनों की भलाइयाँ सिमट आई हैं। आप अल्लाह से गुनाहों पर पर्दा डालने और उन्हें माफ़ करने, अपने ऊपर रहमत की वर्षा बरसाने तथा संदेहों, ग़लत आकांक्षाओं एवं बीमारियों से सुरक्षित रखने, सत्य के मार्ग पर चलाने और उसपर दृढ़ता से क़ायम रखने और ज्ञान, अच्छा कर्म करने का सुयोग एवं हलाल एवं साफ़-सुथरा धन प्रदान करने की दुआ करते थे।

फ़ायदे

  • दो सजदों के बीच के बैठक में यह दुआ पढ़नी चाहिए।
  • इन दुआओं की फ़ज़ीलत, जिनमें दुनिया एवं आख़िरत की भलाइयाँ मौजूद हैं।

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5 एक बार

اللهُمَّ اغْفِرْ لِي ذَنْبِي كُلَّهُ دِقَّهُ، وَجِلَّهُ، وَأَوَّلَهُ وَآخِرَهُ وَعَلَانِيَتَهُ وَسِرَّهُ

अनुवाद और हवाला

अबू हुरैरा -रज़ियल्लाहु अनहु- का वर्णन है कि : अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- सजदे की हालत में यह दुआ किया करते थे : “हे अल्लाह, तू मेरे समस्त पापों को क्षमा कर दे; छोटे-बड़े, अगले-पिछले तथा स्पष्ट-अस्पष्ट सभी को।”

इसे मुस्लिम ने रिवायत किया है दर्जा: स़ह़ीह़

शरह

अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम सजदे में यह दुआ किया करते थे : "اللهم اغفر لي ذنبي" यानी ऐ अल्लाह! मेरे सारे गुनाहों को क्षमा कर दे, उनपर पर्दा डाल दे और मुझे उनके कुप्रभावों से बचाए रख। "كله" सारे गुनाह, "دِقّه" छोटे और कम गुनाह "وجِلّه" तथा बड़े और अधिक गुनाह "وأوله" पहले गुनाह, "وآخره" अंतिम गुनाह और बीच के सारे गुनाह "علانيته وسره" खुले और छुपे गुनाह, जिन्हें तेरे सिवा कोई नहीं जानता।

फ़ायदे

  • इब्न-ए-क़ैयिम कहते हैं : छोटे और बड़े, कम और ज़्यादा, पहले और बाद के तथा छुपे और खुले तमाम गुनाहों से व्यापक अंदाज़ में क्षमा इसलिए माँगी गई है, ताकि सभी गुनाहों से तौबा हो जाए। बंदा जिन्हें जानता है उनसे भी और जिन्हें नहीं जानता उनसे भी।
  • कहा गया है : आपने 'الجِلّ' से पहले 'الدِّق' का ज़िक्र इसलिए किया है कि माँगने वाला माँगते समय दर्जा-ब-दर्जा आगे बढ़ता है। दूसरी बात यह है कि बड़े गुनाह आम तौर पर छोटे गुनाहों पर आग्रह एवं उनके बारे में लापरवाही के नतीजे ही में सामने आते हैं। इसलिए हम कह सकते हैं कि छोटे पाप ही बड़े पापों का ज़रिया हैं और ज़रिया का ज़िक्र पहले किया जाना चाहिए।
  • इन्सान को विनम्रता के साथ अल्लाह से छोटे-बड़े सभी पापों के लिए क्षमा माँगनी चाहिए।
  • नववी कहते हैं : इस हदीस में बार-बार दुआ करने और दुआ के शब्दों का अधिक से अधिक इस्तेमाल करने की प्रेरणा दी गई है, यद्यपि उसके कुछ शब्द कुछ से बेनियाज़ कर देते हों।

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6 एक बार

اللهُمَّ أَعُوذُ بِرِضَاكَ مِنْ سَخَطِكَ، وَبِمُعَافَاتِكَ مِنْ عُقُوبَتِكَ، وَأَعُوذُ بِكَ مِنْكَ لَا أُحْصِي ثَنَاءً عَلَيْكَ أَنْتَ كَمَا أَثْنَيْتَ عَلَى نَفْسِكَ

अनुवाद और हवाला

आइशा रज़ियल्लाहु अनहा का वर्णन है, वह कहती हैं : मुझे एक रात अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम बिस्तर पर नहीं मिले। मैंने ढूँढना शुरू किया, तो मेरे हाथ आपके पैरों के तलवों से जा लगे। दरअसल आप मस्जिद में (सजदे की हालत में) थे और आपके दोनों क़दम खड़े थे। आप फ़रमा रहे थे : (ऐ अल्लाह! तू पवित्र एवं प्रशंसनीय है। तेरे सिवा कोई सत्य पूज्य नहीं है)। तथा एक रिवायत में हैः मेरा हाथ आपके कदमों के भीतरी भाग पर पड़ा, जबकि आप मस्जिद में थे, दोनों क़दम खड़े थे और आप कह रहे थेः (ऐ अल्लाह! मैं तेरे क्रोध से तेरी प्रसन्नता की शरण माँगता हूँ, तेरी सज़ा से तेरे क्षमादान की शरण माँगता हूँ और तुझसे तेरी शरण में आता हूँ। मैं तेरी प्रशंसा अधिकार अनुसार नहीं कर सकता। तू वैसा ही है, जैसा तूने अपने बारे में कहा है)।

इसे मुस्लिम ने रिवायत किया है दर्जा: स़ह़ीह़

शरह

आइशा रज़ियल्लाहु अनहा कहती हैं कि मैं अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के बगल में सोई हुई थी कि रात में आप बिस्तर पर नहीं मिले। मैंने दोनों हाथों से कमरे की उस जगह को टटोला, जहाँ अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम नमाज़ पढ़ा करते थे, तो पाया कि आप सजदे की हालत में हैं, आपके दोनों क़दम खड़े हैं और आप कह रहे हैं :

जिसका अर्थ है : ऐ अल्लाह! मैं तेरे क्रोध से तेरी शरण माँगता हूँ, और तेरी प्रसन्नता को इसके लिए साधण बनाता हूँ। तेरी सज़ा से तेरी अपार क्षमा और आपत्ति से तेरे दूर रखने की शरण माँगता हूँ। मैं तुझ से तेरी और तेरे प्रतापी गुणों से तेरे सुंदर गुणों की शरण माँगता हूँ। क्योंकि तुझसे शरण केवल तू ही दे सकता है। अल्लाह के दरबार को छोड़ न कोई बच निकलने का स्थान है और न कोई शरण स्थल। मैं हज़ार प्रयासों के बावजूद तेरी उन नेमतों एवं उपकारों को सही से गिन नहीं सकता, जो तूने मुझपर किए हैं। (तू वैसा ही हैं जैसा तूने स्वयं अपनी प्रशंसा की है) तू ही है जिसने अपने अस्तित्व की ऐसी प्रशंसा की है जो तेरे लायक़ है, तो कौन तेरी प्रशंसा का हक़ अदा कर सकता है?!

फ़ायदे

  • सजदे में इन दुआओं को पढ़ना मुसतहब है।
  • मीरक कहते हैं : नसाई की एक रिवायत में है : आप यह दुआ उस समय पढ़ते, जब नमाज़ पढ़ लेते और बिस्तर पर चले जाते।
  • अल्लाह के गुणों द्वारा उसकी प्रशंसा करना और किताब व सुन्नत से साबित अल्लाह के नामों द्वारा दुआ करना मुसतहब है।
  • रुकू एवं सजदे में अल्लाह की महानता बयान की जाएगी।
  • जिस प्रकार ख़ुद अल्लाह की शरण माँगना जायज़ है, उसी प्रकार उसके गुणों की शरण माँगना भी जायज़ है।
  • ख़त्ताबी कहते हैं : इस दुआ में एक बारीक नुकता है। नुकता यह है कि अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने अल्लाह से उसकी नाराज़गी से उसकी रज़ा की शरण माँगी है, और उसकी पकड़ से उसकी क्षमा की शरण माँगी है। रज़ा और नाराज़गी दोनों एक-दूसरे के विपरीतार्थक शब्द हैं। इसी प्रकार क्षमा एवं पकड़ भी एक-दूसरे के विपरीतार्थक शब्द हैं। लेकिन जब आपने एक ऐसी हस्ती का ज़िक्र किया, जिसके विपरीत कोई नहीं है, तो केवल उसी की शरण माँगी, किसी और की नहीं। मतलब यह है कि अल्लाह की बख़ूबी इबादत और प्रशंसा में होने वाली कोताही से क्षमा माँगी गई है। दुआ के शब्दों "मैं तेरी प्रशंसा को शुमार और गिन नहीं कर सकता।" का अर्थ है : मैं इसकी क्षमता नहीं रखता और यह मेरे वश का काम नहीं है।

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7 एक बार

التحيَّات المباركات، الصَّلَوَاتُ الطَّيِّبَاتُ لله، السلام عليك أيها النبي ورحمة الله وَبَرَكَاتُهُ، السلام علينا وعلى عباد الله الصالحين، أشهد أَنْ لَا إِلَهَ إِلَّا اللهُ، وأشهد أنَّ محمَّدا رسول الله

अनुवाद और हवाला

इब्ने अब्बास- रज़ियल्लाहु अन्हुमा- से रिवायत है कि अल्लाह के रसूल- सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- हमें तशह्हुद सिखाते थे, जिस प्रकार हमें क़ुरआन की सूरा सिखाते थे। आप कहा करते थेः मुबारक बंदगियां तथा पाक सलातें केवल अल्लाह ही के लिए हैं, ऐ नबी आप पर सलामती और अल्लाह की रहमत एवं उसकी बरकत उतरे, हमारे ऊपर तथा अल्लाह के नेक बंदों पर सलामती हो, मैं गवाही देता हूँ कि अल्लाह के सिवा कोई सत्य पुज्य नहीं और मुहम्मद- सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- अल्लाह के रसूल हैं। इब्ने रुम्ह की रिवायत मैं (इस प्रकार) हैः जैसे हमें क़ुरआन सिखाते थे।

इसे मुस्लिम ने रिवायत किया है। दर्जा: सह़ीह़

8 एक बार

اللَّهُمَّ صَلِّ عَلَى مُحَمَّدٍ وَعَلَى آلِ مُحَمَّدٍ، كَمَا صَلَّيْتَ عَلَى آلِ إِبْرَاهِيمَ، إِنَّكَ حَمِيدٌ مَجِيدٌ، اللَّهُمَّ بَارِكْ عَلَى مُحَمَّدٍ وَعَلَى آلِ مُحَمَّدٍ، كَمَا بَارَكْتَ عَلَى آلِ إِبْرَاهِيمَ، إِنَّكَ حَمِيدٌ مَجِيدٌ

अनुवाद और हवाला

अब्दुर रहमान बिन अबू लैला कहते हैं कि काब बिन उजरा मुझसे मिले और कहने लगे : क्या मैं तुम्हें कोई तोहफ़ा न दूँ? अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम हमारे पास आए, तो हमने कहा : ऐ अल्लाह के रसूल, हम यह तो जान गए हैं कि हम आप पर सलाम कैसे भेजें, लेकिन हम आप पर दरूद कैसे भेजें? तो आपने फ़रमाया : "कहो : «اللَّهُمَّ صَلِّ عَلَى مُحَمَّدٍ وَعَلَى آلِ مُحَمَّدٍ، كَمَا صَلَّيْتَ عَلَى آلِ إِبْرَاهِيمَ، إِنَّكَ حَمِيدٌ مَجِيدٌ، اللَّهُمَّ بَارِكْ عَلَى مُحَمَّدٍ وَعَلَى آلِ مُحَمَّدٍ، كَمَا بَارَكْتَ عَلَى آلِ إِبْرَاهِيمَ، إِنَّكَ حَمِيدٌ مَجِيدٌ» (ऐ अल्लाह! मुहम्मद और मुहम्मद के परिवार-परिजन पर रहमत नाज़िल फरमा, जैसे तूने इबराहीम के परिवार-परिजन पर रहमत नाज़िल की थी। बेशक तू प्रशंसा के योग्य और महिमावान है। ऐ अल्लाह! मुहम्मद और मुहम्मद के परिवार-परिजन पर बरकत नाज़िल फरमा, जैसे तूने इबराहीम के परिवार-परिजन पर बरकत नाज़िल की थी। बेशक तू प्रशंसा के योग्य और महिमावान है।)

इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया है दर्जा: स़ह़ीह़

शरह

सहाबा रज़ियल्लाहु अनहुम को जब पता हो गया कि "अत-तहिय्यात" में "السلام عليك أيها النبي ورحمة الله وبركاته..." कहकर अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम पर सलाम भेजा जाएगा, तो आपसे पूछा कि आप पर दरूद कैसे भेजा जाए? जवाब में अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने उनको आप पर दरूद भेजने के शब्द बता दिए, जो इस प्रकार हैं : "اللهم صلِّ على محمدٍ وعلى آل محمد" (अल्लाहुम्मा सल्लि अला मुहम्मदिन व अला आलि मुहम्मद) यानी ऐ अल्लाह! मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम, आपके दीन का पालन करने वालों और आपके ईमान वाले रिश्तेदारों की प्रशंसा निकटवर्तीय फ़रिश्तों के सामने फ़रमा। "كما صلَّيتَ على آل إبراهيم" (कमा सल्लैता अला आलि इब्राहीम) जिस प्रकार तु ने इबराहीम अलैहिस्सलाम की आल को सम्मान दिया है, उसी प्रकार मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम को भी यह सम्मान प्रदान कर। इबराहीम की आल से तात्पर्य; खुद इब्राहीम, तथा इसमाईल, इसहाक़, उनकी संतान-संतति और उनके मोमिन अनुसरणकारी हैं। "إنك حميد مجيد" (इन्नका हमीदुन मजीद) यानी तो अपनी हस्ती, गुणों एवं कार्यों में प्रशंसित तथा बड़ा महान, अधिकार वाला और दानशील है। "اللهم بارك على محمدٍ وعلى آل محمد كما باركتَ على آل إبراهيم" (अल्लाहुम्मा बारिक अला मुहम्मदिन व अला आलि मुहम्मद, कमा बारकता अला आलि इब्राहीम) यानी आपको बड़ी भलाई एवं सम्मान प्रदान कर, उसे बढ़ाता जा और निरंतर रूप से जारी रख।

फ़ायदे

  • सलफ़ एक-दूसरे को इल्मी मसायल का भेंट दिया करते थे।
  • नमाज़ के अंतिम तशह्हुद में अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम पर दरूद भेजना वाजिब (अनिवार्य) है।
  • अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने अपने सहाबा को आपपर दरूद एवं सलाम भेजने की शिक्षा दी है।
  • दरूद के ये शब्दावली अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम पर दरूद भेजने के सबसे संपूर्ण शब्दावली हैं।

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اللَّهُمَّ إِنِّي أَعُوذُ بِكَ مِنْ عَذَابِ القَبْرِ، وَمِنْ عَذَابِ النَّارِ، وَمِنْ فِتْنَةِ المَحْيَا وَالمَمَاتِ، وَمِنْ فِتْنَةِ المَسِيحِ الدَّجَّالِ

अनुवाद और हवाला

अबू हुरैरा रज़ियल्लाहु अनहु का वर्णन है, वह कहते हैं : अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम इन शब्दों द्वारा दुआ करते थे : "ऐ अल्लाह! मैं तेरी शरण माँगता हूँ क़ब्र की यातना से, जहन्नम की यातना से, जीवन और मृत्यु के फ़ितने से और मसीह-ए-दज्जाल के फ़ितने से।" और मुस्लिम की एक रिवायत में है : "जब तुममें से कोई तशह्हुद पढ़ चुके, तो चार चीज़ों से अल्लाह की शरण माँगे : जहन्नम की यातना से, क़ब्र की यातना से, जीवन और मृत्यु के फ़ितने से और मसीह-ए-दज्जाल के फ़ितने से।"

इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया है दर्जा: स़ह़ीह़

शरह

अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम नमाज़ में अंतिम तशह्हुद के बाद और सलाम से पहले चार चीज़ों से अल्लाह की शरण माँगते थे और हमें भी उनसे अल्लाह की शरण माँगने का आदेश दिया है।

1- क़ब्र की यातना से।

2- जहन्नम की यातना से। यानी क़यामत के दिन।

3- जीवन के फ़ितने, जैसे उसकी हराम आकांक्षाओं और पथभ्रष्ट कर देने वाले संदेहों से तथा मौत के फ़ितने, यानी मौत के समय इस्लाम या सुन्नत से भटक जाने या फिर क़ब्र के फ़ितने, जैसे दो फ़रिश्तों के सवाल से।

4- काना दज्जाल के फ़ितने से, जो अंतिम ज़माने में निकलेगा और जिसके ज़रिए अल्लाह अपने बंदों की परीक्षा लेगा। उसका विशेष रूप से उल्लेख इसलिए किया गया है कि उसका फ़ितना बड़ा भयानक फ़ितना होगा और वह लोगों को बड़े पैमाने पर गुमराह करेगा।

फ़ायदे

  • यह एक सारगर्भित तथा महत्वपूर्ण दुआ है, क्योंकि इसमें दुनिया और आख़िरत की बुराइयों से अल्लाह की शरण माँगी गई है।
  • क़ब्र की यातना का सबूत तथा उसका हक़ होना।
  • फ़ितनों की भयावहता और अल्लाह की सहायता माँगने और उनसे मुक्ति की दुआ करने का महत्व।
  • दज्जाल के निकलने का सबूत और उसके फ़ितने की भयावहता।
  • अंतिम तशह्हुद के बाद इस दुआ को पढ़ना मुसतहब है।
  • अच्छे काम के बाद दुआ करना मुसतहब है।

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اللهم اغفر لي ما قدَّمتُ وما أخَّرتُ، وما أسررتُ وما أعلنتُ، وما أسرفتُ، وما أنت أعلم به مني، أنت المُقَدِّم وأنت المؤَخِّر، لا إله إلا أنت

अनुवाद और हवाला

अली बिन अबू तालिब (रज़ियल्लाहु अन्हु) से वर्णित है कि अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) जब नमाज़ के लिए खड़े होते, तो यह दुआ पढ़तेः «وجَّهت وجْهي للذي فَطَر السَّماوات والأرض حَنيفا، وما أنا من المشركين، إن صلاتي، ونُسُكي، ومَحْيَاي، ومَمَاتِي لله ربِّ العالمين، لا شريك له، وبذلك أُمِرت وأنا من المسلمين، اللهُمَّ أنت الملك لا إله إلا أنت أنت ربِّي، وأنا عَبدُك، ظَلمت نفسي، واعترفت بِذنبي، فاغفر لي ذُنوبي جميعا، إنه لا يَغفر الذُّنوب إلا أنت، واهدِنِي لأحْسَن الأخلاق لا يَهدي لأحْسَنِها إلا أنت، واصرف عَنِّي سيِّئها لا يصرف عني سيِّئها إلا أنت، لبَّيك وسَعديك والخير كلُّه في يَديك، والشَرُّ ليس إليك، أنا بِك وإليك، تَبَاركت وتَعاليت، أستغفرك وأتوب إليك» (मैंने एकाग्र होकर अपना मुख उसकी ओर कर लिया है, जिसने आकाशों और धरती की रचना की है, और मैं साझी ठहराने वालों में से नहीं हूँ। मेरी नमाज़, मेरी क़ुरबानी, मेरा जीना और मेरा मरना, सब अल्लाह के लिए है, जो समस्त संसार का रब है। उसका कोई साझी नहीं। मुझे इसी का आदेश दिया गया है और मैं मुसलमानों में से हूँ। ऐ अल्लाह! तू ही बादशाह है। तेरे सिवा कोई सत्य पूज्य नहीं। तू मेरा रब है और मैं तेरा बंदा। मैंने अपने ऊपर ज़ुल्म किया है और अपने पापों का इक़रार करता हूँ। अतः, मेरे समस्त पापों को क्षमा कर दे, क्योंकि पापों को क्षमा करने वाला तेरे सिवा कोई नहीं। तू मुझे अच्छे आचरण का मार्ग दिखा, क्योंकि अच्छे आचरण का मार्ग केवल तू ही दिखाता है। और बुरे आचरण से मुझे दूर रख, क्योंकि बुरे आचरण से मुझे दूर केवल तू ही रख सकता है। मैं तेरे आगे उपस्थित हूँ, तेरा आज्ञाकारी हूँ तथा समस्त प्रकार की भलाई तेरे ही हाथों में है, और बुराई की निसबत तेरी ओर नहीं की जा सकती। मेरी तौफीक़ तेरी तरफ़ से है और मेरी इल्तिजा भी तुझसे है। तू बरकत वाला तथा बुलंद है। मैं तुझ ही से क्षमा माँगता हूँ तथा तेरे ही सामने तौबा करता हूँ।) और जब रूकू करते, तो कहतेः «اللهُمَّ لك رَكَعت، وبِك آمَنت، ولك أسْلَمت، خَشع لك سَمعي، وبَصري، ومُخِّي، وعَظمي، وعَصَبي» (ऐ अल्लाह! मैंने तेरे ही लिए रुकू किया, मैं तुझपर ईमान लाया और तेरा आज्ञाकारी बना। तेरे लिए मेरे कान, मेरी आँख, मेरे दिमाग, मेरी हड्डी तथा मेरे पुठ्ठे ने विनम्रता दिखाई।) और जब रुकू से सर उठाते, तो कहतेः «اللهُمَّ ربَّنا لك الحَمد مِلْءَ السماوات، و مِلْءَ الأرض، ومِلْءَ ما بينهما، ومِلْءَ ما شئت من شيء بعد» (ऐ अल्लाह! तेरे लिए आकाश भर, धरती भर, और जो कुछ इन दोनों के बीच है, उतनी और उसके पश्चात जितनी तू चाहे, उतनी प्रशंसा है।) और जब सजदा करते, तो कहतेः «اللهُمَّ لك سَجدت، وبك آمَنت، ولك أسْلَمت، سجد وجْهِي للذي خَلَقه، وصَوَّره، وشَقَّ سَمعه وبَصره، تبارك الله أحْسَن الخَالقِين» (ऐ अल्लाह! मैंने तेरे लिए सजदा किया, मैं तुझपर ईमान लाया और तेरा आज्ञाकारी हुआ। मेरे चेहरे ने उसके लिए सजदा किया, जिसने उसकी रचना की है और उसका चित्रण किया है, तथा कान और आँख को चीरा है। अल्लाह तआला बड़ी बरकत वाला है और सभी बनाने वालों से अच्छा बनाने वाला है।) फिर सबसे अंत में तशह्हुद और सलाम फेरने के बीच यह दुआ पढ़तेः «اللهُم اغْفِر لي ما قَدَّمت وما أخَّرت، وما أسْرَرْت وما أعْلَنت، وما أَسْرَفْتُ، وما أنت أعْلَم به مِنِّي، أنت المُقَدِّم وأنت الْمُؤَخِّر، لا إله إلا أنت» (ऐ अल्लाह! मैंने जो पहले किया और जो बाद में किया, जो छिपाकर किया तथा जो दिखाकर किया और जिसमें मैंने अति की और जिसको तू मुझसे भी बेहतर जानने वाला है, उन सभी गुनाहों को माफ़ कर दे। तू ही आदेशपालन का सामर्थ्य देकर आगे करता है और तू ही अवज्ञा के कारण पीछे करता है। तेरे सिवा कोई सत्य पूज्य नहीं है।)

इसे मुस्लिम ने रिवायत किया है। दर्जा: सह़ीह़

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अनुवाद और हवाला

अबू हुरैरा रज़ियल्लाहु अनहु का वर्णन है कि अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया : "बंदा अपने रब से सबसे अधिक निकट उस समय होता है, जब वह सजदे में होता है। अतः तुम उसमें ख़ूब दुआएँ किया करो।"

इसे मुस्लिम ने रिवायत किया है दर्जा: स़ह़ीह़

शरह

अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम बता रहे हैं कि बंदा अपने रब से सबसे ज़्यादा निकट उस समय होता है, जब वह सजदे में होता है। इसका कारण यह है कि सजदे की हालत में बंदा अपने शरीर के सबसे उत्कृष्ट अंग को अल्लाह के लिए विनम्रता धारण करके ज़मीन पर रख देता है।

आपने सजदे की हालत में अधिक से अधिक दुआ करने का आदेश दिया है, ताकि अल्लाह के लिए धारण की जाने वाली इस विनम्रता और विनयशीलता में कार्य के साथ-साथ कथन भी शामिल हो जाए।

फ़ायदे

  • नेकी के काम बंदे को पवित्र एवं महान अल्लाह से निकट ले जाते हैं।
  • सजदे की हालत में प्रचुर मात्रा में दुआ करना मुसतहब है। क्योंकि सजदा दुआ क़बूल होने की जगहों में से एक जगह है।

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