शाम के अज़कार अनुवाद के साथ

सहीह हदीसों के मुताबिक़ शाम को, अस्र की नमाज़ के बाद से रात तक पढ़े जाने वाले अज़कार।

1 3 बार

قُلْ هُوَ اللَّهُ أَحَدٌ ﴿١﴾ اللَّهُ الصَّمَدُ ﴿٢﴾ لَمْ يَلِدْ وَلَمْ يُولَدْ ﴿٣﴾ وَلَمْ يَكُن لَّهُ كُفُوًا أَحَدٌ ﴿٤﴾
قُلْ أَعُوذُ بِرَبِّ الْفَلَقِ ﴿١﴾ مِن شَرِّ مَا خَلَقَ ﴿٢﴾ وَمِن شَرِّ غَاسِقٍ إِذَا وَقَبَ ﴿٣﴾ وَمِن شَرِّ النَّفَّاثَاتِ فِي الْعُقَدِ ﴿٤﴾ وَمِن شَرِّ حَاسِدٍ إِذَا حَسَدَ ﴿٥﴾
قُلْ أَعُوذُ بِرَبِّ النَّاسِ ﴿١﴾ مَلِكِ النَّاسِ ﴿٢﴾ إِلَهِ النَّاسِ ﴿٣﴾ مِن شَرِّ الْوَسْوَاسِ الْخَنَّاسِ ﴿٤﴾ الَّذِي يُوَسْوِسُ فِي صُدُورِ النَّاسِ ﴿٥﴾ مِنَ الْجِنَّةِ وَالنَّاسِ ﴿٦﴾

अनुवाद और हवाला

अब्दुल्लाह बिन ख़ुबैब रज़ियल्लाहु अनहु का वर्णन है, वह कहते हैं : हम एक बारिश वाली तथा अंधेरी रात में अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम को नमाज़ पढ़ाने के लिए ढूँढने निकले। उनका कहना है कि हमने जब आपको पाया तो आपने कहा : "तुम कहो।" लेकिन मैंने कुछ नहीं कहा, तो आपने दोबारा कहा : "तुम कहो।" मैंने फिर भी कुछ नहीं कहा, तो आपने तीसरी बार कहा : "तुम कहो।" इस बार मैंने पूछा कि मैं क्या कहूँ? आपने उत्तर दिया : "तुम सुबह-शाम तीन बार 'क़ुल हुवल्लाहु अह़द', 'क़ुल अऊज़ु बि-रब्बिल फ़लक़' और 'क़ुल अऊज़ु बि-रब्बिन्नास' पढ़ लिया करो। यह तीन सूरतें तुम्हारे लिए हर चीज़ से काफ़ी होंगी।"

इस ह़दीस़ को अबू दावूद, तिर्मिज़ी और नसई ने रिवायत किया है दर्जा: स़ह़ीह़

शरह

वरिष्ठ सहाबी अब्दुल्लाह बिन ख़ुबैब रज़ियल्लाहु अनहु बता रहे हैं कि वे एक तेज़ बारिश वाली और अंधेरी रात में अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम को ढूँढने निकले। ताकि आप उनको नमाज़ पढ़ाएं। जब आपको देखा, तो आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने अब्दुल्लाह से फ़रमाया : तुम पढ़ो। जब उन्होंने कुछ नहीं पढ़ा, तो दोबारा पढ़ने को कहा। इस बार अब्दुल्लाह ने पूछ लिया : ऐ अल्लाह के रसूल! मैं क्या पढ़ूँ? जवाब में अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया : तुम शाम एवं सुबह के समय सूरा इख़लास यानी {قل هو الله أحد} और शरण माँगने पर आधारित दोनों सूरतें सूरा अल-फ़लक़ {قل أعوذ برب الفلق} तथा सूरा अन-नास {قل أعوذ برب الناس} तीन-तीन बार पढ़ो, यह तीनों सूरतें तुम्हें हर बुराई से बचाएँगी।

फ़ायदे

  • सुबह तथा शाम के समय सूरा इख़लास, सूरा फ़लक़ तथा सूरा नास पढ़ना मुसतहब है। यह सूरतें इन्सान को हर बुराई से सुरक्षित रखती हैं।
  • सूरा इख़लास, सूरा फ़लक़ एवं सूरा नास पढ़ने का महत्व।

HadeethEnc.com पर पढ़ें

2 एक बार

أَمْسَيْنَا وَأَمْسَى الْمُلْكُ لِلَّهِ وَالْحَمْدُ لِلَّهِ، لَا إِلَهَ إِلَّا اللهُ وَحْدَهُ لَا شَرِيكَ لَهُ، لَهُ الْمُلْكُ وَلَهُ الْحَمْدُ وَهُوَ عَلَى كُلِّ شَيْءٍ قَدِيرٌ، رَبِّ أَسْأَلُكَ خَيْرَ مَا فِي هَذِهِ اللَّيْلَةِ وَخَيْرَ مَا بَعْدَهَا، وَأَعُوذُ بِكَ مِنْ شَرِّ مَا فِي هَذِهِ اللَّيْلَةِ وَشَرِّ مَا بَعْدَهَا، رَبِّ أَعُوذُ بِكَ مِنَ الْكَسَلِ وَسُوءِ الْكِبَرِ، رَبِّ أَعُوذُ بِكَ مِنْ عَذَابٍ فِي النَّارِ وَعَذَابٍ فِي الْقَبْرِ

अनुवाद और हवाला

अब्दुल्लाह बिन मसऊद (रज़ियल्लाहु अनहु) कहते हैं कि अल्लाह के नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) शाम के समय यह दुआ पढ़तेः "أمسينا وأمسى الملك لله، والحمد لله، لا إله إلا الله وحده لا شريك له" (अर्थात्ः हमने शाम की और अल्लाह के आदेश से देश ने शाम की। सारी प्रशंसा अल्लाह की है। अल्लाह के सिवा कोई पूज्य नहीं है। वह अकेला है। उसका कोई साझी नहीं है।)

वर्णनकर्ता कहते हैंः मुझे लगता है कि आप उक्त शब्दों के साथ यह भी कहा करते थेः "له الملك وله الحمد وهو على كل شيء قدير، ربِّ أسألك خير ما في هذه الليلة وخير ما بعدها، وأعوذ بك من شر ما في هذه الليلة وشر ما بعدها، رب أعوذ بك من الكسل، وسُوءِ الكِبَرِ، رب أعوذ بك من عذاب في النار، وعذاب في القبر" (अर्थात्ः उसी का राज्य है, उसी की प्रशंसा है एवं वह हर चीज़ की शक्ति रखता है। मेरे प्रभु! मैं तुझसे इस रात में जो कुछ है तथा इसके बाद जो कुछ है, उसकी भलाई माँगता हूँ, तथा इस रात में जो कुछ है एवं इसके बाद जो कुछ है, उसकी बुराई से तेरी शरण माँगता हूँ। मेरे प्रभु! मैं सुस्ती एवं अभिमान की बुराई से तेरी शरण माँगता हूँ। मेरे प्रभु! मैं जहन्नम और क़ब्र की यातना से तेरी शरण माँगता हूँ।) तथा जब सुब्ह करते, तो कहतेः "أصبحنا وأصبح الملك لله" (अर्थात्ः हमने सुब्ह की और अल्लाह के लिए देश ने भी सुब्ह की।)

इसे मुस्लिम ने रिवायत किया है। दर्जा: सह़ीह़

3 एक बार

اللَّهُمَّ بِكَ أَمْسَيْنَا، وَبِكَ أَصْبَحْنَا، وَبِكَ نَحْيَا، وَبِكَ نَمُوتُ، وَإِلَيْكَ الْمَصِيرُ

अनुवाद और हवाला

अबू हुरैरा रज़ियल्लाहु अनहु का वर्णन है कि अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया : अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- जब सुबह करते, तो यह दुआ पढ़ते : "ऐ अल्लाह! हमने तेरे (अनुग्रह के) साथ सुबह की और तेरे ही (अनुग्रह के) साथ शाम की और हम तेरे ही (नाम) से जीते हैं और तेरे ही (नाम) से मरते हैं, और हमें तेरी ही ओर उठकर जाना है।" और जब शाम करते, तो यह दुआ पढ़ते : “ऐ अल्लाह! हमने तेरे (अनुग्रह के) साथ शाम की और तेरे ही (अनुग्रह के) साथ सुबह की और हम तेरे ही (नाम) से जीते हैं और तेरे ही (नाम) से मरते हैं, और हमें तेरी ही ओर उठकर जाना है। फ़रमाया : और दूसरी बार (कहा:) "तेरी ही ओर लौटकर जाना है।”

इसे अबू दावूद ने, तिर्मिज़ी ने तथा नसई ने अल-सुनन अल-कुबरा में एवं इब्न-ए-माजह ने रिवायत किया है दर्जा: ह़सन

शरह

जब सुबह होती यानी फ़ज्र के प्रकट होने के साथ दिन का पहला भाग प्रवेश करता तो अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम यह दुआ पढ़ते :

ऐ अल्लाह! हमने तेरी प्रदान की हुई सुरक्षा में, तेरी दी हुई नेमतों से लाभान्वित होते हुए, तेरे ज़िक्र में व्यस्त रहकर, तेरे नाम से मदद माँगते हुए, तेरे सुयोग के साये में और तेरी दी हुई शक्ति एवं सामर्थ्य से गतिमान रहकर सुबह की। और हम ने तेरी (नेमतों के) साथ शाम किया, हम तेरे जीवनदाता नाम के साथ जीते हैं और तेरे मृत्यु देने वाले नाम के साथ मरते हैं। हमें तेरी ही ओर उठकर जाना है। इस दुआ में आए हुए शब्द "अल-नुशूर" का अर्थ है मौत के बाद दोबारा उठाया जाना तथा एकत्र होने के बाद अलग-अलग होना। हमारा हाल तमाम परिस्थितियों और समयों में यही रहता है। मैं न इससे अलग हूँ और न जुदा।

इसी प्रकार जब आपके सामने शाम आती, जो अस्र के बाद शुरू होता है, तो कहते :(हे अल्लाह! हम ने तेरी (नेमतों) के साथ सुबह किया, हम तेरे (जीवनदाता) नाम के साथ जीते हैं और तेरे (मृत्यु देने वाले) नाम के साथ मरते हैं, और तेरी ओर ही लौटना है) अर्थात: दुनिया में लौटना तेरी ओर ही है तथा आख़िरत में ठिकाना भी तेरी ओर है। अतः तू ही हमें जीवन देता है और तू ही हमें मौत देता है।

फ़ायदे

  • अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम का अनुसरण करते हुए इस दुआ को सुबह-शाम पढ़ना मुसतहब है।
  • बंदा हर पल और हर अवस्था में अल्लाह का मोहताज है।
  • इन अज़कार को पढ़ने का सबसे उत्तम समय दिन के पहले भाग में फ़ज्र होने से सूरज निकलने तक और दिन के अंतिम भाग में अस्र के बाद से सूरज डूबने तक है। अगर कोई बाद में भी पढ़ता है, यानी सुबह सूरज ऊँचा हो जाने के बाद पढ़ता है तब भी काफ़ी है, ज़ुहर के बाद पढ़ता है तब भी काफ़ी है और मग़्रिब के बाद पढ़ता है तब भी काफ़ी है।
  • दुआ के शब्दों "व इलैक अल-नुशूर" का सुबह के समय से बड़ा संबंध है। ये शब्द इन्सान को क़यामत के दिन के उस दृश्य की याद दिलाते हैं, जब इन्सान को मौत के बाद दोबारा जीवित किया जाएगा। यह एक नई ज़िंदगी होगी। एक नया दिन होगा, जब प्राणों को शरीर में लौटाया जाएगा। लोग हर तरफ़ बिखरे हुए होंगे। जबकि अब अल्लाह की पैदा की हुई यह नई सुबह भी इसलिए सामने आ रही है कि इन्सान पर गवाह रहे और उसका एक-एक क्षण एवं एक-एक पल हमारे कर्मों के ख़ज़ाने बनें।
  • इसी प्रकार दुआ के शब्दों "व इलैक अल-मसीर" का भी शाम के समय से बड़ा संबंध है। शाम के समय लोग अपने कामों, कारोबारों और जीविन की दौड़-धूप के बाद वापस होते हैं। अपने-अपने घरों को लौटते हैं। बिखर जाने के बाद (काम-काज से वापस आकर) आराम करते हैं। इस प्रकार, ये शब्द उच्च एवं महान अल्लाह की ओर लौटने की याद दिलाते हैं और यह कि अंतिम ठिकाना और पड़ाव उसी के पास है।

HadeethEnc.com पर पढ़ें

4 एक बार

اللَّهُمَّ أَنْتَ رَبِّي لَا إِلَهَ إِلَّا أَنْتَ خَلَقْتَنِي وَأَنَا عَبْدُكَ وَأَنَا عَلَى عَهْدِكَ وَوَعْدِكَ مَا اسْتَطَعْتُ أَعُوذُ بِكَ مِنْ شَرِّ مَا صَنَعْتُ أَبُوءُ لَكَ بِنِعْمَتِكَ عَلَيَّ وَأَبُوءُ لَكَ بِذَنْبِي فَاغْفِرْ لِي فَإِنَّهُ لَا يَغْفِرُ الذُّنُوبَ إِلَّا أَنْتَ

अनुवाद और हवाला

शद्दाद बिन औस रज़ियल्लाहु अनहु का वर्णन है कि अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया : “सय्यदुल इस्तिग़फार (सर्वश्रेष्ठ क्षमायाचना) यह है कि बंदा इस प्रकार कहे : ऐ अल्लाह, तू ही मेरा रब है। तेरे सिवा कोई सत्य पूज्य नहीं है। तू ने ही मेरी रचना की है और मैं तेरा बंदा हूँ। मैं तुझसे की हुई प्रतिज्ञा एवं वादे को हर संभव पूरा करने का प्रयत्न करूँगा। मैं अपने कर्म की बुराई से तेरी शरण चाहता हूँ। मैं तेरी ओर से दी जाने वाली नेमतों (अनुग्रहों) का तथा अपनी ओर से किए जाने वाले पापों का इक़रार करता हूँ। तू मुझे माफ कर दे, क्योंकि तेरे सिवा पापों को क्षमा करने वाला कोई नहीं।” आपने कहा : "जिसने इसे विश्वास के साथ दिन में कहा और उसी दिन शाम से पहले मर गया, वह जन्नतवासी है। और जिसने इसे विश्वास के साथ रात में कहा और सुबह होने से पहले मर गया, वह जन्नतवासी है।"

इसे बुख़ारी ने रिवायत किया है दर्जा: स़ह़ीह़

शरह

अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम बता रहे हैं कि क्षमा याचना के कुछ शब्द निर्धारित हैं और इसके सबसे उत्तम एवं महान शब्द यह हैं : "ऐ अल्लाह, तू ही मेरा रब है। तेरे सिवा कोई सत्य पूज्य नहीं है। तू ने ही मेरी रचना की है और मैं तेरा बंदा हूँ। मैं तुझसे की हुई प्रतिज्ञा एवं वादे को हर संभव पूरा करने का प्रयत्न करूँगा। मैं अपने हर उस कृत्य से तेरी शरण चाहता हूँ, जिसके कारण मैं तेरी रहमत से दूर हो जाऊँ। मैं तेरी ओर से दी जाने वाली नेमतों (अनुग्रहों) का इक़रार करता हूँ तथा अपनी ओर से किए जाने वाले पापों को भी स्वीकार करता हूँ। अतः तू मुझे माफ कर दे, क्योंकि तेरे सिवा पापों को क्षमा करने वाला कोई नहीं।” इन शब्दों द्वारा बंदा अल्लाह के एक होने के साथ-साथ इस बात का इक़रार करता है कि अल्लाह उसका स्रष्टा और पूज्य है। उसका कोई साझी नहीं है। वह अल्लाह से किए हुए ईमान और आज्ञापालन के वादे पर जहाँ तक हो सकेगा, क़ायम रहेगा। क्योंकि बंदा जितनी भी इबादत कर ले, अल्लाह के तमाम आदेशों का पालन और उसकी नेमतों का शुक्रिया उस तरह नहीं कर सकता, जिस तरह किया जाना चाहिए। वह अल्लाह के यहाँ शरण लेता है और उसकी रस्सी को मज़बूती से थाम लेता है, क्योंकि बंदे को उनके द्वारा किए गिए बुरे कामों से शरण वही देता है। वह अल्लाह की दी हुई नेमतों का इक़रार भी करता है और अपने गुनाहों एवं अवज्ञाकारियों का एतराफ़ भी। इसके बाद बंदा अपने रब से दुआ करता है कि उसके गुनाहों पर पर्दा डाल दे, क्षमा, अनुग्रह एवं दया से काम लेते हुए उसे उसके गुनाहों के बुरे परिणामों से बचा ले। क्योंकि गुनाहों को क्षमा करने का काम सर्वशक्तिमान एवं महान अल्लाह के सिवा कोई नहीं कर सकता। फिर आपने बताया कि यह सुबह-शाम के अज़कार में से है। जिसने इसे यक़ीन के साथ, इसके अर्थ को ज़ेहन में रखते हुए और इसपर विश्वास रखते दिन के आरंभ में यानी सूरज निकलने से ढलने तक के बीच कहा और फिर मर गया, वह जन्नत में प्रवेश करेगा। इसी तरह जिसने इसे रात में यानी सूरज डूबने के समय से फ़ज्र होने के समय के बीच कहा और सुबह होने से पहले मर गया, वह भी जन्नत में दाख़िल होगा।

फ़ायदे

  • क्षमा याचना के अलग-अलग शब्दावली सिखाए गए हैं, जिनमें से कुछ अन्य के तुलना में श्रेष्ठ हैं।
  • इस दुआ द्वारा अल्लाह से दुआ करने का प्रयास करना चाहिए, क्योंकि यह दुआ सय्यदुल-इस्तिग्फार है (अर्थात; यह दुआ क्षमा याचना के लिए अग्रणी दुआ है)।

HadeethEnc.com पर पढ़ें

5 3 बार

بِسْمِ اللَّهِ الَّذِي لَا يَضُرُّ مَعَ اسْمِهِ شَيْءٌ فِي الْأَرْضِ وَلَا فِي السَّمَاءِ وَهُوَ السَّمِيعُ الْعَلِيمُ

अनुवाद और हवाला

अबान बिन उसमान से रिवायत है, वह कहते हैं कि मैंने उसमान बिन अफ़्फ़ान रज़ियल्लाहु अनहु को कहते हुए सुना है कि मैंने अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम को कहते हुए सुना है : "जिसने तीन बार यह दुआ पढ़ी : उस अल्लाह के नाम के साथ, जिसके नाम के साथ ज़मीन व आसमान में कोई चीज़ नुक़सान नहीं पहुँचाती और वह सब कुछ सुनने वाला सब कुछ जानने वाला है। उसपर सुबह तक अचानक कोई मुसीबत नहीं आएगी। इसी तरह जिसने इसे सुबह के समय तीन बार पढ़ लिया, उसपर शाम होने तक अचानक कोई मुसीबत नहीं आएगी।" वर्णनकर्ता का कहना है कि बाद में अबान बिन उसमान पर फ़ालिज का हमला हो गया, तो उनसे यह हदीस सुनने वाला व्यक्ति उनकी ओर देखने लगा। तो अबान ने उनसे पूछा : बात क्या है कि तुम मेरी ओर देखे जा रहे हो? अल्लाह की क़सम, न मैंने उसमान की ओर मंसूब करके झूठी बात कही है और न उसमान ने अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- की ओर मंसूब करके झूठी बात कही है। दरअसल बात यह है कि जिस दिन मुझपर फ़ालिज का हमला हुआ, उस दिन ग़ुस्से का शिकार होकर इस दुआ को पढ़ना भूल गया था।

इसे अबू दावूद ने, तिर्मिज़ी ने तथा नसई ने अल-कुबरा में इसी प्रकार इब्न-ए-माजह ने और अह़मद ने रिवायत किया है दर्जा: स़ह़ीह़

शरह

अल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने बताया है कि जिसने हर रोज़ सुबह फ़ज्र होने के बाद और हर रोज़ शाम को सूरज डूबने से पहले यह दुआ पढ़ी : मैं उस अल्लाह की मदद लेता और हर कष्टदायक वस्तु से उसकी सुरक्षा में जाता हूँ, जिसका नाम ले लेने के बाद कोई बड़ी से बड़ी चीज़, ज़मीन से निकलने वाली बला हो कि आसमान से उतरने वाली मुसीबत, नुक़सान नहीं पहुँचाती, वह हमारी बातों को सुनने वाला और हमारे हालात की ख़बर रखने वाला है।

तो यह दुआ शाम के समय पढ़ लेने की स्थिति में उसे सुबह तक कोई चीज़ अचानक नुक़सान नहीं पहुँचाएगी और सुबह के समय पढ़ने की स्थिति में कोई चीज़ शाम तक अचानक नुक़सान नहीं पहुँचा सकती।

बाद में इस हदीस के वर्णनकर्ता अबान बिन उसमान पर फ़ालिज का हमला हो गया। याद रहे कि फ़ालिज एक बीमारी है, जिससे शरीर का एक भाग काम करना बंद कर देता है। अतः उनसे हदीस सुनने वाला व्यक्ति आश्चर्यचकित होकर उनकी ओर देखने लगा।, तो उन्होंने उस व्यक्ति से कहा : बात क्या है कि तुम मेरी ओर देखे जा रहे हो? अल्लाह की क़सम! न मैंने उसमान की ओर मंसूब करके झूठी हदीस सुनाई है और न उसमान ने अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- की ओर मंसूब करके झूठी हदीस सुनाई है। दरअसल जिस दिन मुझपर फ़ालिज का हमला हुआ, उस दिन मैं यह दुआ पढ़ नहीं सका था। मैं उस दिन ग़ुस्से का शिकार हो गया था और उक्त दुआ को पढ़ना भूल गया था।

फ़ायदे

  • इस ज़िक्र को सुबह-शाम पढ़ना मुसतहब है। ताकि इन्सान इसे पढ़ लेने के बाद किसी बला एवं मुसीबत के अचानक हमले से सुरक्षित रहे।
  • पहले दौर के सलफ़ का अल्लाह पर मज़बूत विश्वास और अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- की बातों की पुष्टि।
  • सुबह व शाम ज़िक्र करने का एक फ़ायदा यह है कि इन्सान की अचेतना दूर हो जाती है और हमेशा ज़ेहन में रहता है कि वह अल्लाह का बंदा है।
  • ज़िक्र का असर उतना ही दिखता है, जितना ज़िक्र करने वाले के अंदर अल्लाह पर ईमान, विनयशीलता, तल्लीनता, अल्लाह के प्रति निष्ठा एवं विश्वास हो।

HadeethEnc.com पर पढ़ें

6 एक बार

اللَّهُمَّ إِنِّي أَسْأَلُكَ الْعَفْوَ وَالْعَافِيَةَ فِي الدُّنْيَا وَالْآخِرَةِ، اللَّهُمَّ إِنِّي أَسْأَلُكَ الْعَفْوَ وَالْعَافِيَةَ فِي دِينِي وَدُنْيَايَ وَأَهْلِي وَمَالِي، اللَّهُمَّ اسْتُرْ عَوْرَاتِي، وَآمِنْ رَوْعَاتِي، اللَّهُمَّ احْفَظْنِي مِنْ بَيْنِ يَدَيَّ، وَمِنْ خَلْفِي، وَعَنْ يَمِينِي، وَعَنْ شِمَالِي، وَمِنْ فَوْقِي، وَأَعُوذُ بِعَظَمَتِكَ أَنْ أُغْتَالَ مِنْ تَحْتِي

अनुवाद और हवाला

अब्दुल्लाह बिन उमर रज़ियल्लाहु अनहुमा का वर्णन है, वह कहते हैं : अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम सुबह और शाम के समय इन दुआओं को पढ़ना नहीं छोड़ते थे : "ऐ अल्लाह! मैं तुझसे दुनिया एवं आख़िरत में सुरक्षा माँगता हूँ। ऐ अल्लाह! मैं तुझसे अपने धर्म, अपने संसार, अपने परिवार और अपने धन के संबंध में क्षमा एवं सुरक्षा माँगता हूँ। ऐ अल्लाह! मेरी त्रुटियों को छुपा दे और मुझे भय से सुरक्षा प्रदान कर। ऐ अल्लाह! तू मेरी, मेरे आगे, मेरे पीछे, मेरे दाएँ, मेरे बाएँ और मेरे ऊपर से रक्षा कर। मैं इस बात से तेरी महानता की शरण में आता हूँ कि मुझे नीचे से धर दबोचा जाए।"

इस ह़दीस़ को अबू दावूद, नसई, इब्न-ए-माजह और अह़मद ने रिवायत किया है दर्जा: स़ह़ीह़

शरह

अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम सुबह एवं शाम के समय इन दुआओं को पढ़ना नहीं भूलते थे :

"ऐ अल्लाह! मैं तुझसे आफियत मांगता हूं" एवं सुरक्षा मांगता हूं बुराइयों, विपत्तियों, सांसारिक कठिनाइयों, बुरी आकांक्षाओं तथा दीनी फ़ितनों से। "दुनिया में भी और आख़िरत में भी" यानी इस जीवन में और आख़िरत में अर्थात बाद में।

ऐ अल्लाह! मैं तुझसे गुनाहों को मिटा दिए जाने, माफ़ कर देने तथा कमियों एवं कोताहियों से बचाए रखने की दुआ करता हूँ। कमियाँ दीन से संबंधित हों, जैसे शिर्क, बिदअत एवं गुनाह आदि या दुनिया से संबंधित हों, जैसे विपत्तियाँ, कष्ट एवं बुराइयाँ। परिवार यानी पत्नी, बाल बच्चों एवं रिश्तेदारों से संंबंधित हों या धन एवं कर्म से।

ऐ अल्लाह! मेरी छूपी हुई बातों, मेरे ऐबों, कमियों और कोताहियों पर पर्दा डाल दे और मेरे गुनाह मिटा दे। मुझे भयमुक्त बनाए रख।

(ऐ अल्लाह! मेरी रक्षा कर) और सभी कष्टदायक चीज़ों और विपत्तियों को मुझसे दूर रख (मेरे आगे से और पीछे से, मेरे दाएं से और बाएं से, और मेरे ऊपर से), आपने अल्लाह से सभी दिशाओं से अपनी रक्षा करने के लिए दुआ की; क्योंकि मुसीबतें और विपत्तियाँ व्यक्ति पर इन दिशाओं में से एक से उस तक आती हैं।

और मैं इस बात से तेरी महानता की शरण माँगता हूँ कि नीचे की ओर से अचानक मेरी पकड़ हो जाए और अचेतना की अवस्था में विनष्ट हो जाऊँ और अंततः मैं ज़मीन में धँसा दिया जाऊँ।

फ़ायदे

  • अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम का अनुकरण करते हुए इन शब्दों को पाबंदी के साथ कहना चाहिए।
  • इन्सान को जिस तरह दीन के बारे में शांति एवं सुरक्षा माँगने की दुआ करने का आदेश दिया गया है, उसी प्रकार दुनिया के बारे में भी शांति एवं सुरक्षा की दुआ करने का आदेश दिया गया है।
  • तीबी कहते हैं : आपने छह दिशाओं का ज़िक्र इसलिए किया कि विपत्तियाँ इन्हीं दिशाओं से आती हैं। फिर नीचे की दिशा पर अधिक ज़ोर इसलिए डाला गया है कि इस ओर से आने वाली विपत्ति बदतरीन विपत्ति हुआ करती है।
  • इन अज़कार को पढ़ने का सबसे बेहतर समय दिन के पहले भाग में फ़ज्र प्रकट होने से लेकर सूरज डूबने तक है और दिन के अंतिम भाग में अस्र के बाद से लेकर सूरज डूबने तक है। अगर कोई बाद में, यानी सुबह सूरज ऊँचा होने के बाद पढ़ता है, तब भी काफ़ी है। ज़ुहर के बाद पढ़ता है, तब भी काफ़ी है और मग़्रिब के बाद पढ़ता है, तब भी काफ़ी है। यही ज़िक्र का समय है।
  • जब किसी ज़िक्र के बारे में इस बात की दलील मौजूद हो कि उसका समय रात ही में निर्धारित है, जैसे सूरा बक़रा की अंतिम दो आयतों को पढ़ना, तो ऐसे ज़िक्र को रात में सूरज डूबने के बाद ही पढ़ा जाएगा।

HadeethEnc.com पर पढ़ें

7 एक बार

اللهم فاطِرَ السماوات والأرض عالم الغيبِ والشهادة، ربَّ كُلِّ شَيءٍ ومَلِيكَه، أَشْهد أن لا إله إلا أنت، أعوذ بك من شرِّ نفسي وشرِّ الشيطان وشِرْكِهِ وأن أقترف على نفسي سوءًا أو أجرُّه إلى مسلم

अनुवाद और हवाला

अबू हुरैरा (रज़ियल्लाहु अनहु) से रिवायत है कि अबू बक्र सिद्दीक (रज़ियल्लाहु अनहु) ने कहा कि ऐ अल्लाह के रसूल! मुझे कुछ ऐसे शब्द बताइए, जो मैं सुब्ह- शाम कहा करूँ। आपने फ़रमायाः कह लिया करोः اللهم فاطِرَ السماوات والأرض عالم الغيبِ والشهادة، ربَّ كُلِّ شَيءٍ ومَلِيكَه، أَشْهد أن لا إله إلا أنت، أعوذ بك من شرِّ نفسي وشرِّ الشيطان وشِرْكِهِ وأن أقترف على نفسي سوءًا أو أجرُّه إلى مسلم" (अर्थात्ः ऐ अल्लाह, ऐ आकाशों एवं धरती के रचयिता, छिपे तथा खुले को जानने वाले, प्रत्येक वस्तु का रब और प्रभु! मैं गवाही देता हूँ कि तेरे सिवा कोई पूज्य नहीं है। मैं अपनी आत्मा की बुराई, शैतान की बुराई एवं उसकी साझेदारी से तेरी शरण माँगता हूँ, तथा इस बात से भी तेरी शरण माँगता हूँ कि अपना तथा किसी मुसलामन का कुछ बुरा करूँ।) इसे सुब्ह- शाम और सोते समय कहा करो।

इसे तिर्मिज़ी ने रिवायत किया है। - इसे नसाई ने रिवायत किया है। - इसे अबू दाऊद ने रिवायत किया है। - इसे अह़मद ने रिवायत किया है। दर्जा: सह़ीह़

8 एक बार

آمَنَ الرَّسُولُ بِمَا أُنْزِلَ إِلَيْهِ مِنْ رَبِّهِ وَالْمُؤْمِنُونَ كُلٌّ آمَنَ بِاللَّهِ وَمَلَائِكَتِهِ وَكُتُبِهِ وَرُسُلِهِ لَا نُفَرِّقُ بَيْنَ أَحَدٍ مِنْ رُسُلِهِ وَقَالُوا سَمِعْنَا وَأَطَعْنَا غُفْرَانَكَ رَبَّنَا وَإِلَيْكَ الْمَصِيرُ ﴿٢٨٥﴾ لَا يُكَلِّفُ اللَّهُ نَفْسًا إِلَّا وُسْعَهَا لَهَا مَا كَسَبَتْ وَعَلَيْهَا مَا اكْتَسَبَتْ رَبَّنَا لَا تُؤَاخِذْنَا إِنْ نَسِينَا أَوْ أَخْطَأْنَا رَبَّنَا وَلَا تَحْمِلْ عَلَيْنَا إِصْرًا كَمَا حَمَلْتَهُ عَلَى الَّذِينَ مِنْ قَبْلِنَا رَبَّنَا وَلَا تُحَمِّلْنَا مَا لَا طَاقَةَ لَنَا بِهِ وَاعْفُ عَنَّا وَاغْفِرْ لَنَا وَارْحَمْنَا أَنْتَ مَوْلَانَا فَانْصُرْنَا عَلَى الْقَوْمِ الْكَافِرِينَ ﴿٢٨٦﴾

अनुवाद और हवाला

अब्दुल्लाह बिन मसऊद रज़ियल्लाहु अनहु का वर्णन है, वह कहते हैं कि अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया : "जिसने सूरा बक़रा की अंतिम दो आयतें रात में पढ़ लीं, वह उसके लिए काफ़ी हो जाती हैं।"

इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया है दर्जा: स़ह़ीह़

शरह

अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम बता रहे हैं कि जिसने रात में सूरा बक़रा की अंतिम दो आयतें पढ़ लीं, तो अल्लाह उसे बुराई तथा अप्रिय चीज़ों से बचाने के लिए काफ़ी हो जाता है। कुछ लोगों का कहना है कि यह दोनों आयतें उसके लिए तहज्जुद की नमाज़ के बदले में काफ़ी हो जाती हैं। कुछ लोगों का कहना है कि अन्य अज़कार के बदले में काफ़ी हो जाती हैं। जबकि कुछ लोगों का कहना है कि रात की नमाज़ में कम से कम इन दो आयतों को पढ़ लेना ही काफ़ी है। कुछ और भी बातें कही गई हैं। हो सकता है कि ऊपर कही गई सारी बातें सही हों और सब हदीस के शब्दों के दायरे में आ जाती हों।

फ़ायदे

  • सूरा बक़रा की अंतिम आयतों की फ़ज़ीलत का बयान। यह आयतें इस तरह हैं : {ءَامَنَ ٱلرَّسُولُ بِمَآ أُنزِلَ إِلَيۡهِ مِن رَّبِّهِۦ وَٱلۡمُؤۡمِنُونَۚ كُلٌّ ءَامَنَ بِٱللَّهِ وَمَلَٰٓئِكَتِهِۦ وَكُتُبِهِۦ وَرُسُلِهِۦ لَا نُفَرِّقُ بَيۡنَ أَحَدٖ مِّن رُّسُلِهِۦۚ وَقَالُواْ سَمِعۡنَا وَأَطَعۡنَاۖ غُفۡرَانَكَ رَبَّنَا وَإِلَيۡكَ ٱلۡمَصِيرُ. لا يُكَلِّفُ ٱللَّهُ نَفۡسًا إِلَّا وُسۡعَهَاۚ لَهَا مَا كَسَبَتۡ وَعَلَيۡهَا مَا ٱكۡتَسَبَتۡۗ رَبَّنَا لَا تُؤَاخِذۡنَآ إِن نَّسِينَآ أَوۡ أَخۡطَأۡنَاۚ رَبَّنَا وَلَا تَحۡمِلۡ عَلَيۡنَآ إِصۡرٗا كَمَا حَمَلۡتَهُۥ عَلَى ٱلَّذِينَ مِن قَبۡلِنَاۚ رَبَّنَا وَلَا تُحَمِّلۡنَا مَا لَا طَاقَةَ لَنَا بِهِۦۖ وَٱعۡفُ عَنَّا وَٱغۡفِرۡ لَنَا وَٱرۡحَمۡنَآۚ أَنتَ مَوۡلَىٰنَا فَٱنصُرۡنَا عَلَى ٱلۡقَوۡمِ ٱلۡكَٰفِرِينَ.} (रसूल उस चीज़ पर ईमान लाए, जो उनकी तरफ़ उनके रब की ओर से उतारी गई तथा सब ईमान वाले भी। हर एक अल्लाह और उसके फ़रिश्तों और उसकी पुस्तकों और उसके रसूलों पर ईमान लाया। (वे कहते हैं) हम उसके रसूलों में से किसी एक के बीच अंतर नहीं करते। और उन्होंने कहा हमने सुना और हमने आज्ञापालन किया। हम तेरी क्षमा चाहते हैं ऐ हमारे रब! और तेरी ही ओर लौटकर जाना है। अल्लाह किसी प्राणी पर भार नहीं डालता परंतु उसकी क्षमता के अनुसार। उसी के लिए है जो उसने (नेकी) कमाई और उसी पर है जो उसने (पाप) कमाया। ऐ हमारे रब! हमारी पकड़ न कर यदि हम भूल जाएँ या हमसे चूक हो जाए। ऐ हमारे रब! और हमपर कोई भारी बोझ न डाल, जैसे तूने उसे उन लोगों पर डाला जो हमसे पहले थे। ऐ हमारे रब! और हमपर उसका बोझ न डाल जिसके (उठाने) की हम में शक्ति न हो। तथा हमें माफ़ कर और हमें क्षमा कर दे और हमपर दया कर। तू ही हमारा स्वामी (संरक्षक) है, इसलिए काफ़िरों के मुक़ाबले में हमारी मदद कर।)
  • सूरा बक़रा की अंतिम आयतों को रात में पढ़ने से इन्सान बुराई तथा शैतान से सुरक्षित रहता है।
  • रात सूरज डूबने के बाद से शुरू होती है और फ़ज्र प्रकट होने तक रहती है।

HadeethEnc.com पर पढ़ें

9 10 बार

لَا إِلَهَ إِلَّا اللهُ وَحْدَهُ لَا شَرِيكَ لَهُ، لَهُ الْمُلْكُ وَلَهُ الْحَمْدُ، وَهُوَ عَلَى كُلِّ شَيْءٍ قَدِيرٌ

अनुवाद और हवाला

अबू अय्यूब रज़ियल्लाहु अनहु का वर्णन है कि अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया : “जिसने दस बार 'ला इलाहा इल्लल्लाहु वह़दहु ला शरीका लहु, लहुल-मुल्कु व लहुल-हम्दु, व हुवा अला कुल्लि शैइन क़दीर' (अर्थात, अल्लाह के सिवा कोई वास्तविक पूज्य नहीं, वह अकेला है, उसका कोई साझी नहीं है, पूरा राज्य उसी का है और सब प्रशंसा उसी की है और उसके पास हर चीज़ का सामर्थ्य है।) कहा, वह उस व्यक्ति के समान है, जिसने इसमाईल (अलैहिस्सलाम) की संतान में से चार दासों को मुक्त किया।”

इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया है दर्जा: स़ह़ीह़

शरह

अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम बता रहे हैं कि जिसने इस ज़िक्र को दिन में दस बार पढ़ा : "ला इलाहा इल्लल्लाहु वह़दहु ला शरीका लहु, लहुल-मुल्कु व लहुल-हम्दु, व हुवा अला कुल्लि शैइन क़दीर।" यानी अल्लाह को छोड़कर कोई सच्चा पूज्य नहीं है। वह अकेला है। उसका कोई साझी नहीं है। उसी के पास संपूर्ण राज्य है। केवल वही प्रेम तथा सम्मान के साथ प्रशंसा का हक़दार है। उसके सिवा कोई इस बात का हक़दार नहीं है। वह बड़ा क्षमतावान है। उसे कोई विवश नहीं कर सकता। जिसने इस ज़िक्र को दिन में दस बार पढ़ा, उसे उस व्यक्ति के समान सवाब मिलेगा, जिसने इसमाईल बिन इबराहीम अलैहिमस्सलाम की नस्ल के दस दासों को मुक्त किया हो। यहाँ विशेष रूप से इसमाईल अलैहिस्सलाम की नस्ल का उल्लेख इसलिए किया गया है कि उनकी नस्ल के लोग अन्य लोगों से श्रेष्ठ हैं।

फ़ायदे

  • इस ज़िक्र की फ़ज़ीलत, जिसमें एकमात्र अल्लाह को इबादत एवं प्रशंसा का हक़दार तथा संपूर्ण राज्य एवं सामर्थ्य का मालिक बताया गया है।
  • इस ज़िक्र का सवाब लगातार तथा अंतराल के साथ दोनों तरह से पढ़ने वाले को मिलेगा।

HadeethEnc.com पर पढ़ें

10 100 बार

سُبْحَانَ اللَّهِ وَبِحَمْدِهِ

अनुवाद और हवाला

अबू हुरैरा रज़ियल्लाहु अनहु का वर्णन है कि अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया : “जिसने दिन भर में सौ बार 'सुबहानल्लाहि व बिह़म्दिहि' (अल्लाह के लिए पवित्रता है उसकी प्रशंसा के साथ) कहा, उसके सारे पाप क्षमा कर दिए जाएँगे, यद्यपि वे समुद्र के झाग के बराबर ही क्यों न हों।”

इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया है दर्जा: स़ह़ीह़

शरह

अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम बता रहे हैं कि जिसने दिन एवं रात में सौ बार 'सुबहानल्लाहि व बिह़म्दिहि' (अल्लाह के लिए पवित्रता है उसकी प्रशंसा के साथ) कहा, उसके गुनाह मिटा तथा क्षमा कर दिए जाते हैं, यद्यपि उसके गुनाह इतने अधिक हों कि समुद्र के झाग के बराबर मालूम होते हों।

फ़ायदे

  • यह सवाब लगातार तथा अंतराल के साथ दोनों तरह कहने से प्राप्त होगा।
  • तसबीह का मलतब है अल्लाह को सभी कमियों से पवित्र कहना और ह़म्द (प्रशंसा) का अर्थ है उसे प्रेम तथा सम्मान के साथ हर प्रकार से संपूर्ण मानना।
  • इस हदीस से मुराद छोटे गुनाहों का माफ़ होना है। बड़े गुनाह तौबा के बिना माफ़ नहीं होते।

HadeethEnc.com पर पढ़ें

सवाल

इस पेज पर क्या है?

शाम के अज़कार: हर एक अरबी में, अपने अनुवाद, स्रोत हदीस, दर्जे और शरह के साथ।

अनुवाद कहां से लिए गए हैं?

HadeethEnc.com से, जो अनूदित नबवी हदीसों का विश्वकोश है। हर हदीस ठीक वैसे ही दिखाई जाती है जैसे वहां प्रकाशित हुई, अपने हवाले और दर्जे के साथ, और मूल का लिंक भी दिया जाता है।

काउंटर कैसे काम करता है?

किसी ज़िक्र के नीचे काउंटर पर टैप करें, वह शून्य तक उल्टी गिनती करता है। यह सिर्फ़ इसी पेज पर है और कुछ भी सेव नहीं होता।

क्या मुझे रोज़ाना रिमाइंडर मिल सकता है?

जी हां। Android के लिए मुफ़्त Qabas ऐप आपको हर दिन सुबह और शाम के अज़कार याद दिलाता है और उसमें यही काउंटर है।