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पाठ 4 / 11

क्या नबी मुहम्मद ﷺ ने क़ुरआन लिखा?

संक्षिप्त जवाब

मुसलमानों का विश्वास है कि क़ुरआन अल्लाह का कलाम है, मुहम्मद ﷺ का नहीं। नबी ﷺ पढ़ना-लिखना नहीं जानते थे, और उन्हें क़ुरआन फ़रिश्ते जिब्रील से मिला, जिसकी शुरुआत चालीस वर्ष की उम्र में मक्का के पास हिरा की गुफा में हुई। क़ुरआन कहता है: “और न वह अपनी इच्छा से बोलता है”, और जो भी इसमें शक करे उसे चुनौती देता है कि इस जैसी एक सूरह ही बना लाए।

क़बस द्वारा लिखा गया और अल-मुख़्तसर फ़ी तफ़्सीर अल-क़ुरआन अल-करीम, तफ़्सीर इब्ने कसीर और HadeethEnc.com की व्याख्याएँ से जाँचा गया।

क़ुरआन से

وَمَا كُنتَ تَتۡلُواْ مِن قَبۡلِهِۦ مِن كِتَٰبٖ وَلَا تَخُطُّهُۥ بِيَمِينِكَۖ إِذٗا لَّٱرۡتَابَ ٱلۡمُبۡطِلُونَ ﴿٤٨﴾

और आप इससे पहले न कोई पुस्तक पढ़ते थे और न उसे अपने दाहिने हाथ से लिखते थे। (यदि ऐसा होता) तो असत्यवादी अवश्य संदेह करते।

Al-'Ankabut 29:48क़ुरआन में पढ़ें
आयतों की तफ़्सीर

और (ऐ रसूल) आप क़ुरआन से पहले न कोई किताब पढ़ेते थे और न अपने दाहिने हाथ से कुछ लिखते थे। क्योंकि आप 'उम्मी' (अनपढ़) हैं, लिखना और पढ़ना नहीं जानते हैं।और अगर आप पढ़ना और लिखना जानते होते, तो अज्ञानी लोग आपकी नुबुव्वत के बारे में अवश्य संदेह करते और यह तर्क देते कि आप पिछली किताबों की बातें लिखा करते थे।

مَا ضَلَّ صَاحِبُكُمۡ وَمَا غَوَىٰ ﴿٢﴾ وَمَا يَنطِقُ عَنِ ٱلۡهَوَىٰٓ ﴿٣﴾ إِنۡ هُوَ إِلَّا وَحۡيٞ يُوحَىٰ ﴿٤﴾ عَلَّمَهُۥ شَدِيدُ ٱلۡقُوَىٰ ﴿٥﴾

तुम्हारा साथी न तो रास्ते से भटका है और न ही गलत रास्ते पर चला है। और न वह अपनी इच्छा से बोलता है। वह तो केवल वह़्य है, जो उतारी जाती है। उसे बहुत मज़ूबत शक्तियों वाले (फ़रिश्ते) ने सिखाया है।

An-Najm 53:2-5क़ुरआन में पढ़ें
आयतों की तफ़्सीर

मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम न हिदायत के रास्ते से भठके हैं और न टेढ़ी राह पर चले हैं, बल्कि वह सीधे रास्ते पर क़ायम हैं।

और वह इस क़ुरआन को अपनी इच्छा से नहीं बोलते हैं।

यह क़ुरआन तो केवल वह़्य (प्रकाशना) है, जिसे अल्लाह जिबरील अलैहिस्सलाम के माध्यम से आप (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) पर उतारता है।

उसे आप (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) को एक बहुत मज़बूत शक्ति वाले फ़रिश्ते अर्थात् जिबरील अलैहिस्सलाम ने सिखाया है।

وَمَا كَانَ هَٰذَا ٱلۡقُرۡءَانُ أَن يُفۡتَرَىٰ مِن دُونِ ٱللَّهِ وَلَٰكِن تَصۡدِيقَ ٱلَّذِي بَيۡنَ يَدَيۡهِ وَتَفۡصِيلَ ٱلۡكِتَٰبِ لَا رَيۡبَ فِيهِ مِن رَّبِّ ٱلۡعَٰلَمِينَ ﴿٣٧﴾ أَمۡ يَقُولُونَ ٱفۡتَرَىٰهُۖ قُلۡ فَأۡتُواْ بِسُورَةٖ مِّثۡلِهِۦ وَٱدۡعُواْ مَنِ ٱسۡتَطَعۡتُم مِّن دُونِ ٱللَّهِ إِن كُنتُمۡ صَٰدِقِينَ ﴿٣٨﴾

और यह क़ुरआन ऐसा नहीं है कि अल्लाह के अलावा किसी और द्वारा घड़ लिया जाए, बल्कि यह उसकी पुष्टि करता है, जो इससे पहले है और किताब का विवरण (अर्थात् हलाल एवं हराम तथा धर्म के नियमों की व्याख्या) है। इसमें कोई संदेह नहीं कि यह सारे संसारों के पालनहार की ओर से है। क्या वे कहते हैं कि उसने इस (क़ुरआन) को स्वयं गढ़ लिया हैॽ आप कह दें : तो तुम इस जैसी एक सूरत ले आओ और अल्लाह के सिवा जिसे बुला सको बुला लो, यदि तुम सच्चे हो।

Yunus 10:37-38क़ुरआन में पढ़ें
आयतों की तफ़्सीर

यह क़ुरआन कोई ऐसी किताब नहीं है कि उसे गढ़ लिया जाए और अल्लाह के अलावा किसी और की ओर मंसूब कर दिया जाए, क्योंकि लोग निश्चित रूप से इस क़ुरआन जैसी किताब लाने में असमर्थ हैं। बल्कि यह क़ुरआन उससे पहले उतरने वाली किताबों की पुष्टि करने वाला तथा उन पुस्तकों में सार रूप से वर्णन किए गए अहकाम का विवरण प्रस्तुत करने वाला है। अतः इसमें कोई संदेह नहीं कि यह सभी प्राणियों के पालनहार सर्वशक्तिमान (अल्लाह) की ओर से उतारा गया है।

बल्कि, क्या ये बहुदेववादी कहते हैं : मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने इस क़ुरआन को अपनी तरफ़ से गढ़ लिया है और उसे अल्लाह की तरफ़ मंसूब कर दिया है? (ऐ रसूल!) आप उनका खंडन करते हुए कह दें : यदि (तुम्हारे कहने के अनुसार) मैं इसे अपनी तरफ़ से गढ़कर लाया हूँ, जबकि मैं तुम्हारे ही जैसा एक इनसान हूँ, तो तुम इसके समान एक सूरत ही ले आओ और अपनी सहायता के लिए जिसे बुला सकते हो, बुला लो, यदि तुम अपने इस दावे में सच्चे हो कि क़ुरआन मनगढ़ंत और झूठा है। सच्चाई यह है कि तुम ऐसा कभी नहीं कर पाओगे। यदि तुम भाषाविद तथा वाक्पटु होने के बावजूद ऐसा नहीं कर सकते, तो यह इस बात का प्रमाण है कि क़ुरआन अल्लाह की ओर से उतरने वाली पुस्तक है।

सुन्नत से

मुसलमानों की माता आइशा -रज़ियल्लाहु अनहा- का वर्णन है, वह कहती हैं : अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- पर वह्य की शुरूआत सच्चे ख़्वाबों की शक्ल में हुई। आप जो कुछ ख़्वाब में देखते, वह सुबह की रोशनी की तरह प्रकट होता। फिर आपको तन्हाई पसन्द हो गई। फिर आप ग़ार-ए-हिरा में तन्हाई इख़्तियार फ़रमाते और कई-कई रात घर तशरीफ़ लाए बग़ैर इबादत में लगे रहते। आप खाने-पीने का सामान घर से ले जाकर वहाँ कुछ रोज़ गुज़ारते, फिर ख़दीजा (रज़ियल्लाहु अन्हा) के पास वापस आते और तकरीबन इतने ही दिनों के लिए फिर कुछ खाने-पीने का सामान ले जाते। एक रोज़ आप हिरा में थे कि इतने में आपके पास हक आ गया और फ़रिश्ते ने आकर आपसे कहा : पढ़ो! आपने फ़रमाया : मैं पढ़ा हुआ नहीं हूँ। आप कहते हैं कि इसपर फ़रिश्ते ने मुझे पकड़कर ख़ूब दबाया, यहाँ तक कि मेरी सहन शक्ति जवाब देने लगी। फिर उसने मुझे छोड़ दिया और कहा : पढ़ो! फिर मैं ने कहा : मैं तो पढ़ा हुआ नहीं हूँ। उसने दोबारा मुझे पकड़कर दबोचा, यहां तक कि मेरी सहन शक्ति जवाब देने लगी। फिर छोड़कर कहा : पढ़ो! मैंने फिर कहा कि मैं पढ़ा हुआ नहीं हूँ। उसने तीसरी बार मुझे पकड़कर दबाया, फिर छोड़ कर कहा : {पढ़ो अपने रब के नाम से जिसने पैदा किया, जिसने इन्सान को ख़ून के लोथड़े से पैदा किया, पढ़ो और तुम्हारा रब तो निहायत करीम है।} [सूरा अल-अलक़ :1-3] रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- इन आयतों को लेकर वापस आए। उस समय आपका दिल धड़क रहा था। तब आप (अपनी बीवी) ख़दीजा बिन्ते ख़ुवैलिद रज़ियल्लाहु अन्हा के पास तशरीफ़ लाए और फ़रमाया : “मुझे चादर ओढ़ा दो, मुझे चादर ओढ़ा दो।” उन्होंने आपको चादर ओढ़ा दी, यहाँ तक कि डर की हालत खत्म हो गई। फिर आपने ख़दीजा रज़ियल्लाहु अन्हा को इस घटना की सूचना देते हुए फ़रमाया : “मुझे अपनी जान का डर रहा है।” ख़दीजा रज़ियल्लाहु अन्हा ने कहा : बिल्कुल नहीं, अल्लाह की क़सम! अल्लाह आपको कभी ज़लील नहीं करेगा। आप रिश्ते जोड़ते हैं, कमज़ोरों का बोझ उठाते हैं, फ़क़ीरों व मोहताजों को खर्च देते हैं, मेहमानों की खातिरदारी करते हैं और हक के सिलसिले में पेश आने वाली तकलीफों में मदद करते हैं। फिर ख़दीजा रज़ियल्लाहु अन्हा, रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- को साथ लेकर अपने चचेरे भाई वरक़ा बिन नौफ़ल बिन असद बिन अब्दुल उज़्ज़ा के पास आईं। वरक़ा जिहालत के ज़माने में ईसाइ हो गए थे और इब्रानी (हिब्रु) ज़बान भी लिखना जानते थे। चुनांचे इब्रानी ज़बान में जितना अल्लाह को मन्ज़ूर होता, इंजील लिखते थे। वरक़ा बहुत बूढ़े और अंधे हो चुके थे। उनसे ख़दीजा -रज़ियल्लाहु अन्हा- ने कहा : हे मेरे चचा के लड़के! आप अपने भतीजे की बात सुनें। वरक़ा ने पूछा : भतीजे क्या देखते हो? रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने जो कुछ देखा था, वह बयान कर दिया। इसपर वरक़ा ने आपसे कहा : यह तो वही नामूस (वह्य लाने वाला फ़रिश्ता) है, जिसे अल्लाह ने मूसा -अलैहिस्सलाम- पर उतारा था। काश मैं ताक़तवर होता, काश मैं उस वक़्त तक ज़िन्दा रहूँ, जब आपकी क़ौम आपको निकाल देगी। रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फ़रमाया : अच्छा तो क्या वह लोग मुझे निकाल देंगे? वरक़ा ने कहा : हाँ! जब भी कोई आदमी इस तरह का पैग़ाम लाया, जैसा आप लाए हैं तो उससे ज़रूर दुश्मनी की गई और अगर मुझे आपका ज़माना नसीब हुआ, तो मैं आपकी भरपूर मदद करूँगा। फिर कुछ ही समय बाद वरक़ा की मृत्यु हो गई और वह्य का सिलसिला बंद हो गया।

इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया है स़ह़ीह़ HadeethEnc.com
व्याख्या

मुसलमानों की माता आइशा -रज़ियल्लाहु अनहा- बता रही हैं कि अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- पर वह्य आने का आरंभ इस प्रकार हुआ कि पहले नींद की अवस्था में सच्चे सपने आते थे। जब कोई सपना देखते, वह सुबह के प्रकाश के समान साफ-साफ़ प्रकट हो जाता। फिर आप एकांत प्रिय बन गए। आप हिरा नामी गुफा में एकांत में रहा करते थे। वहाँ कई-कई रातों तक इबादत में रहा करते। खाने-पीने की चीज़ें भी साथ ले जाते। जब खाने-पीने की चीज़ें ख़त्म हो जातीं, तो मुसलमानों की माता ख़दीजा -रज़ियल्लाहु अनहा- के पास वापस आते और दोबारा कई रातों के लिए खाने-पीने की चीज़ें साथ ले जाते। यह सिलसिला जारी था कि आपपर हिरा गुफा के अंदर ही सत्य आ गया। आपके पास जिबरील नामी फ़रिश्ता आया और बोला कि आप पढ़िए। उत्तर में आपने कहा कि मुझे पढ़ना नहीं आता। आपका कहना है कि इसपर उसने मुझे पकड़कर इस तरह दबोचा कि मेरी सहन-शक्ति जवाब देने लगी। फिर उसने मुझे छोड़ दिया और दोबारा पढ़ने के लिए कहा। मैंने फिर उत्तर दिया कि मुझे पढ़ना नहीं आता, तो दोबारा पकड़कर इस तरह दबोचा कि मेरी सहन-शक्ति जवाब देने लगी। फिर छोड़ दिया और पढ़ने के लिए कहा। मैंने फिर उत्तर दिया कि मुझे पढ़ना नहीं आता, तो तीसरी बार पकड़कर दबोचा और उसके बाद कहा : "अपने रब के नाम से पढ़, जिसने पैदा किया। जिसने मनुष्य को रक्त के लोथड़े से पैदा किया। पढ़, और तेरा रब बड़ा दया वाला है।" [सूरा अलक़ : 1-3] इसके बाद अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- इन आयतों के साथ घर लौटे। आपका दिल मौत के डर से धड़क रहा था। मुसलमानों की माता ख़दीज़ा बिन्ते ख़ुवैलिद -रज़ियल्लाहु अनहा- के पास पहुँचे और फ़रमाया : मुझे कपड़े ओढ़ा दो। मुझे कपड़े ओढ़ा दो। चुनांचे आपको कपड़ा ओढ़ा दिया गया और भय दूर हो गया। अतः जो कुछ हुआ था, ख़दीजा -रज़ियल्लाहु अनहा- को बताया और कहा : मुझे अपनी जान का डर लग रहा है। यह सुन ख़दीजा -रज़ियल्लाहु अनहा- ने कहा : ऐसा हरगिज़ नहीं हो सकता। अल्लाह की क़सम, अल्लाह आपको कभी ज़लील कर नहीं सकता। आप रिश्ते जोड़ते हैं, ऐसे कमज़ोर लोगों का बोझ उठाते हैं जो ख़ुद अपना बोझ उठा नहीं सकते, फ़क़ीरों एवं निर्धनों को जिनका कोई सहारा नहीं होता खर्च देते हैं, मेहमानों की खातिरदारी करते हैं और हक के सिलसिले में पेश आने वाली तकलीफों में मदद करते हैं। इसके बाद ख़दीजा -रज़ियल्लाहु अनहा- आपको लेकर वरक़ा बिन नौफ़ल बिन अब्दुल उज़्ज़ा के पास पहुँचीं। वरक़ा उनके चचेरे भाई थे। वह जाहिलीयत (अरब के मुशरिकीन का रास्ता) छोड़कर ईसाई बन चुके थे। इंजील का कुछ भाग इब्रानी भाषा में लिखा करते थे। बहुत बूढ़े हो चुके थे। देखने की क्षमता भी खो चुके थे। ख़दीजा ने उनसे कहा : ऐ मेरे चचेरे भाई! अपने भतीजे की बात सुन लें। यह सुन वरक़ा ने आपसे पूछा : भतीजे, बताइए, बात क्या है? चुनांचे अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने जो कुछ देखा था, सब कुछ बता दिया। सब कुछ सुनने के बाद वरक़ा ने कहा : यह वही जिब्रील फ़रिश्ता है, जिसे अल्लाह ने मूसा -अलैहिस्सलाम- पर उतारा था। काश मैं उस समय ताक़तवर होता, काश मैं उस समय जीवित रहता, जब आपकी क़ौम आपको निकाल बाहर करेगी। यह सुन अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने पूछा : क्या लोग मुझे निकाल बाहर करेंगे? उन्होंने उत्तर दिया : हाँ। जब भी कोई व्यक्ति उस तरह का संदेश लाया जो आप लाए हैं, उसे कष्ट दिया गया और लोग उसके दुश्मन होगए। अगर मुझे आपका वह दिन मिल सका, तो मैं आपकी भरपूर मदद करूँगा। इसके कुछ समय बाद ही वरक़ा की मृत्यु हो गई और कुछ समय के लिए वह्य आने का सिलसिला बंद हो गया।

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