وَقَالُوٓاْ ءَامَنَّا بِهِۦ وَأَنَّىٰ لَهُمُ ٱلتَّنَاوُشُ مِن مَّكَانِۭ بَعِيدٖ ٥٢
और वे पुकार उठेंगे : हम (अब) उसपर43 ईमान ले आए। लेकिन इतनी दूर जगह44 से उनके लिए ईमान की प्राप्ति कहाँ से संभव है?
फ़ुटनोट
43 अर्थात अल्लाह तथा उस के रसूल पर।
44 ईमान लाने का स्थान तो संसार था। परंतु संसार में उसे अस्वीकार कर दिया।
तफ़सीर
और जब वे अपना परिणाम देख लेंगे, तो कहेंगे : हम क़ियामत के दिन पर ईमान लाए। भला अब उनके लिए ईमान ग्रहण करना कैसे संभव है, जबकि ईमान की स्वीकृति का स्थान उनसे बहुत दूर हो गया है?! क्योंकि वे दुनिया के घर से, जो केवल कार्य करने का स्थान है, बदले का नहीं, (उससे) निकलकर आखिरत के घर में प्रवेश कर चुके हैं, जो केवल बदला दिए जाने का घर है, कार्य करने का नहीं।