إِنَّ عِدَّةَ ٱلشُّهُورِ عِندَ ٱللَّهِ ٱثۡنَا عَشَرَ شَهۡرٗا فِي كِتَٰبِ ٱللَّهِ يَوۡمَ خَلَقَ ٱلسَّمَٰوَٰتِ وَٱلۡأَرۡضَ مِنۡهَآ أَرۡبَعَةٌ حُرُمٞۚ ذَٰلِكَ ٱلدِّينُ ٱلۡقَيِّمُۚ فَلَا تَظۡلِمُواْ فِيهِنَّ أَنفُسَكُمۡۚ وَقَٰتِلُواْ ٱلۡمُشۡرِكِينَ كَآفَّةٗ كَمَا يُقَٰتِلُونَكُمۡ كَآفَّةٗۚ وَٱعۡلَمُوٓاْ أَنَّ ٱللَّهَ مَعَ ٱلۡمُتَّقِينَ ٣٦
निःसंदेह अल्लाह के निकट महीनों की संख्या, अल्लाह की किताब में बारह महीने है, जिस दिन उसने आकाशों तथा धरती की रचना की। उनमें से चार महीने हुरमत16 वाले हैं। यही सीधा धर्म है। अतः इनमें अपने प्राणों पर अत्याचार17 न करो। तथा बहुदेववादियों से सब मिलकर युद्ध करो, जैसे वे तुमसे मिलकर युद्ध करते हैं, और जान लो कि निःसंदेह अल्लाह मुत्तक़ी लोगों के साथ है।
फ़ुटनोट
16 जिनमें युद्ध निषेध है। और वे ज़ुलक़ादा, ज़ुल ह़िज्जा, मुह़र्रम तथा रजब के महीने हैं। (बुख़ारी : 4662)
17 अर्थात इनमें युद्ध तथा रक्तपात न करो, इनका आदर करो।
तफ़सीर
निःसंदेह अल्लाह के निर्णय और फैसले के अनुसार वर्ष के महीनों की संख्या बारह है, जिसे उसने आकाशों और धरती की रचना के समय ही लौह़-ए-मह़फूज़ में लिख दिया था। इन बारह महीनों में से चार महीनों में अल्लाह ने लड़ने से मना किया है। इनमें से तीन महीने तगातार हैं : 'ज़ुलक़ादा, ज़ुलहिज्जा और मुहर्रम' और एक अकेला, जो कि 'रजब' है। यह जो वर्ष के महीनों की संख्या और उनमें से चार के हुरमत वाले होने का उल्लेख किया गया है, वही सीधा धर्म है। अतः इन हुरमत वाले महीनों के अंदर युद्ध करके और उनकी पवित्रता को भंग करके अपने प्राणों पर अत्याचार न करो। तथा बहुदेववादियों से सब मिलकर युद्ध करो, जैसे वे मिलकर तुमसे युद्ध करते हैं। और यह जान लो कि अल्लाह अपनी मदद और सुदृढ़ीकरण के द्वारा उन लोगों के साथ है, जो उसके आदेशों का पालन करके और उसके निषेधों से बचकर उससे डरते हैं। और जिसके साथ अल्लाह हो, उसे कोई पराजित नही कर सकता।