أَمۡ لَهُمۡ شُرَكَٰٓؤُاْ شَرَعُواْ لَهُم مِّنَ ٱلدِّينِ مَا لَمۡ يَأۡذَنۢ بِهِ ٱللَّهُۚ وَلَوۡلَا كَلِمَةُ ٱلۡفَصۡلِ لَقُضِيَ بَيۡنَهُمۡۗ وَإِنَّ ٱلظَّٰلِمِينَ لَهُمۡ عَذَابٌ أَلِيمٞ ٢١
या इन (मुश्रिकों) के कुछ ऐसे साझी20 हैं, जिन्होंने उनके लिए धर्म का एक ऐसा नियम निर्धारित किया है जिसकी अल्लाह ने अनुमति नहीं दी है? और यदि नियत की हुई बात न होती, तो अवश्य उनके बीच निर्णय कर दिया जाता तथा निश्चय ही अत्याचारियों के लिए दुखद यातना है।
फ़ुटनोट
20 इससे अभिप्राय उनके वे प्रमुख हैं जो वैध-अवैध का नियम बनाते थे। इसमें यह संकेत है कि धार्मिक जीवन-विधान बनाने का अधिकार केवल अल्लाह को है। उसके सिवा दूसरों के बनाए हुये धार्मिक जीवन-विधान को मानना और उसका पालन करना शिर्क है।
तफ़सीर
क्या इन मुश्रिकों के अल्लाह के अलावा कुछ अन्य पूज्य हैं, जिन्होंने उनके लिए धर्म के ऐसे प्रावधान निर्धारित किए हैं, जिन्हें निर्धारित करने की अनुमति अल्लाह ने उन्हें नहीं दी है, जैसे अल्लाह का साझी बनाना, उसकी हलाल की हुई चीज़ को हराम करना और उसकी हराम की हुई चीज़ को हलाल कर लेना? अगर अल्लाह ने इन विभेद करने वालों के बीच निर्णय के लिए एक निश्चित समय निर्धारित न कर दिया होता और यह कि उस समय तक उनके मामले को विलंबित कर देगा, तो अवश्य उनके बीच निर्णय कर दिया जता। निःसंदेह अल्लाह के साथ शिर्क और गुनाहों के द्वारा अपने ऊपर अत्याचार करने वालों के लिए दर्दनाक यातना है, जो क़ियामत के दिन उनकी प्रतीक्षा कर रही है।