وَمَآ ءَاتَيۡتُم مِّن رِّبٗا لِّيَرۡبُوَاْ فِيٓ أَمۡوَٰلِ ٱلنَّاسِ فَلَا يَرۡبُواْ عِندَ ٱللَّهِۖ وَمَآ ءَاتَيۡتُم مِّن زَكَوٰةٖ تُرِيدُونَ وَجۡهَ ٱللَّهِ فَأُوْلَٰٓئِكَ هُمُ ٱلۡمُضۡعِفُونَ ٣٩
और तुम ब्याज पर जो (उधार) देते हो, ताकि वह लोगों के धनों में मिलकर अधिक14 हो जाए, तो वह अल्लाह के यहाँ अधिक नहीं होता। तथा तुम अल्लाह का चेहरा चाहते हुए जो कुछ ज़कात से देते हो, तो वही लोग कई गुना बढ़ाने वाले हैं।
फ़ुटनोट
14 इस आयत में सामाजिक अधिकारों की ओर ध्यान दिलाया गया है कि जब सब कुछ अल्लाह ही का दिया हुआ है, तो तुम्हें अल्लाह की प्रसन्नता के लिए सबका अधिकार देना चाहिए। ह़दीस में है कि जो व्याज खाता-खिलाता है और उसे लिखता तथा उसपर गवाही देता है उस पर नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने धिक्कार किया है।
तफ़सीर
जो धन तुम किसी आदमी को इस उद्देश्य से देते हो कि वह तुम्हें उसमें कुछ वृद्धि के साथ वापस करे, तो उसका सवाब अल्लाह के यहाँ नहीं बढ़ेगा। और जो कुछ तुम अपने माल में से किसी ऐसे व्यक्ति को देते हो, जो उससे अपनी ज़रूरत पूरी करता है, जिससे तुम अल्लाह का चेहरा चाहते हो, तुम्हारा इरादा कोई पद (सामाजिक स्थिति) या लोगों से प्रतिफल प्राप्त करना नहीं है, तो ऐसे ही लोग हैं जिनके प्रतिफल को अल्लाह के यहाँ कई गुना कर दिया जाएगा।