فَـَٔاتِ ذَا ٱلۡقُرۡبَىٰ حَقَّهُۥ وَٱلۡمِسۡكِينَ وَٱبۡنَ ٱلسَّبِيلِۚ ذَٰلِكَ خَيۡرٞ لِّلَّذِينَ يُرِيدُونَ وَجۡهَ ٱللَّهِۖ وَأُوْلَٰٓئِكَ هُمُ ٱلۡمُفۡلِحُونَ ٣٨
अतः रिश्तेदार को उसका हक़ दो, तथा निर्धन और यात्री को (भी)। यह उन लोगों के लिए बेहतर है, जो अल्लाह का चेहरा चाहते हैं और वही सफल होने वाले हैं।
तफ़सीर
अतः (ऐ मुसलमान!) तुम रिश्तेदार के साथ भलाई और एहसान का वह मामला करो, जिसका वह हक़दार है, तथा ज़रूरतमंद को इतना दो, जिससे उसकी आवश्यकता पूरी हो सके, तथा उस यात्री को भी दो, जिसका अपने देश से रास्ता कट गया है। इन भलाई के कार्यों में खर्च करना उन लोगों के लिए बेहतर है, जो उससे अल्लाह का चेहरा (प्रसन्नता) चाहते हैं। जो लोग इस सहायता और अधिकारों का निष्पादन करते हैं, वही लोग उस जन्नत को प्राप्त कर, जिसे वे तलब करते हैं, तथा उस यातना से सुरक्षित रहकर, जिससे वे डर रहे हैं, सफल होने वाले हैं।