सूरह Al-Ma'idah, आयत 43

5:43

وَكَيۡفَ يُحَكِّمُونَكَ وَعِندَهُمُ ٱلتَّوۡرَىٰةُ فِيهَا حُكۡمُ ٱللَّهِ ثُمَّ يَتَوَلَّوۡنَ مِنۢ بَعۡدِ ذَٰلِكَۚ وَمَآ أُوْلَٰٓئِكَ بِٱلۡمُؤۡمِنِينَ ٤٣

और वे आपको कैसे न्यायकर्ता बनाते हैं, जबकि उनके पास तौरात है, जिसमें अल्लाह का हुक्म (मौजूद) है! फिर वे उसके पश्चात मुँह फेर लेते हैं। और ये लोग कदापि ईमान वाले नहीं।31

फ़ुटनोट

31 क्योंकि वे न तो आपको नबी मानते, और न आपका निर्णय मानते, तथा न तौरात का आदेश मानते हैं।

तफ़सीर

इन लोगों का मामला निश्चय आश्चर्यजनक है। वे आपपर विश्वास नहीं रखते हैं, फिर भी अपने मामले का फ़ैसला कराने के लिए आपके पास इस आशा में आते हैं कि आपका फ़ैसला उनकी इच्छाओं के अनुसार हो जाए। जबकि उनके पास तौरात है, जिसपर वे ईमान रखने का दावा करते हैं, जिसमें अल्लाह का आदेश (फ़ैसला) मौजूद है। फिर वे आपके फ़ैसले से मुँह मोड़ लेते हैं, यदि वह उनकी इच्छाओं से मेल नहीं खाता है। इस तरह उन्होंने अपनी किताब में मौजूद हुक्म का इनकार किया है और आपके फ़ैसले से मुँह फेरा है। इनका यह व्यवहार ईमान वालों का व्यवहार नहीं है। इसलिए वे आपपर और आपकी लाई हुई शरीयत पर ईमान रखने वाले नहीं हैं।