أَلَهُمۡ أَرۡجُلٞ يَمۡشُونَ بِهَآۖ أَمۡ لَهُمۡ أَيۡدٖ يَبۡطِشُونَ بِهَآۖ أَمۡ لَهُمۡ أَعۡيُنٞ يُبۡصِرُونَ بِهَآۖ أَمۡ لَهُمۡ ءَاذَانٞ يَسۡمَعُونَ بِهَاۗ قُلِ ٱدۡعُواْ شُرَكَآءَكُمۡ ثُمَّ كِيدُونِ فَلَا تُنظِرُونِ ١٩٥
क्या इन (पत्थर की मूर्तियों) के पाँव हैं, जिनसे वे चलती हैं? या उनके हाथ हैं, जिनसे वे पकड़ती हैं? या उनकी आँखें हैं, जिनसे वे देखती हैं? या उनके कान हैं, जिनसे वे सुनती हैं? आप कह दें कि अपने साझियों को बुला लो, फिर मेरे विरुद्ध उपाय करो और मुझे कोई अवसर न दो!
तफ़सीर
क्या इन मूर्तियों के, जिन्हें तुमने पूज्य बना रखा है, पाँव हैं, जिनसे वे चलती हैं, कि तुम्हारी ज़रूरतें पूरी करें? या उनके हाथ हैं, जिनसे वे तुम्हारा पूरी शक्ति से बचाव करें? या उनकी आँखें हैं, जिनसे वे उन चीज़ों को देखती हैं, जिन्हें तुम नहीं देख सकते कि तुम्हें उनसे अवगत करा सकें? या उनके कान हैं, जिनसे वे उन बातों को सुन लेती हैं, जिन्हें तुम नहीं सुन सकते, तो वे तुम्हें उनसे सूचित कर देती हैं? अगर वे इन सारी चीज़ों से खाली हैं, तो फिर तुम उन्हें लाभ प्राप्त करने या हानि से बचने की आशा में कैसे पूजते हो?! (ऐ रसूल!) आप इन मुश्रिकों से कह दें : उन लोगों को पुकारो, जिन्हें तुमने अल्लाह के बराबर बना रखा है, फिर तुम मुझे नुक़सान पहुँचाने का उपाय करो और मुझे कोई मोहलत न दो।