मुसीबत और नुक़सान के वक़्त की दुआ (इन्ना लिल्लाह)

किसी नुक़सान या मुसीबत के वक़्त क्या कहें, और ग़मज़दा को तसल्ली के अल्फ़ाज़।

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إِنَّا لِلهِ وَإِنَّا إِلَيْهِ رَاجِعُونَ، اللَّهُمَّ أْجُرْنِي فِي مُصِيبَتِي، وَأَخْلِفْ لِي خَيْرًا مِنْهَا

अनुवाद और हवाला

मुसलमानों की माता उम्म-ए-सलमा -रज़ियल्लाहु अनहा- से वर्णित है, वह कहती हैं कि मैंने अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- को फ़रमाते हुए सना है : ''जब किसी मुसलमान को कोई दुख पहुँचता है, और वह यह दुआएँ पढ़ता है, जिनका अल्लाह ने आदेश दिया है : (हम सब अल्लाह के हैं और हमें उसी की ओर लौटकर जाना है।) [सूरा अल-बक़रा : 156], (हे अल्लाह! मुझे मेरे दुःख का प्रतिफल दे और उसका बेहतर बदल दे।), तो अल्लाह उसे पिछले की जगह पर पिछले से अच्छा बदल प्रदान करता है।'' वह कहती हैं : जब अबू सलमा की मौत हो गई, तो मैंने सोचा कि कौन-सा मुसलमान अबू सलमा से अच्छा हो सकता है? उनका परिवार पहला परिवार था, जिसने रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- की ओर हिजरत किया! फिर मैंने यह दुआएँ पढ़ीं, तो अल्लाह ने उनके बदले मुझे अपने रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- को प्रदान किया।

इसे मुस्लिम ने रिवायत किया है दर्जा: स़ह़ीह़

शरह

मुसलमानों की माता आइशा -रज़ियल्लाहु अनहा- कहती हैं कि उन्होंने एक दिन अल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- को कहते हुए सुना है : जब किसी मुसलमान पर कोई मुसीबत आती है और वह कहता है यह वाक्य जो अल्लाह ने उसके लिए पसंद किया है : {हम अल्लाह ही के हैं और हमें उसी की ओर लौटकर जाना है।} [सूरा बक़रा : 156], ऐ अल्लाह! मुझे इस मुसीबत पर सब्र करने का प्रतिफल प्रदान कर और इसका मुझे बेहतर बदला दे, तो अल्लाह उसे बेहतर बदला प्रदान करता है। उनका कहना है कि जब उनके पति अबू सलमा की मृत्यु हो गई, तो मैंने अपने दिल में कहा कि अबू सलमा से बेहतर भला कौन-सा मुसलमान हो सकता है? उनका घर अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- की ओर हिजरत करने वाला पहला घर था। तब अल्लाह ने मेरी मदद की और मैं ने यह वाक्य कह दिया, तो अल्लाह ने अबू सलमा के स्थान पर मुझे अल्लाह के रसूल को दे दिया, जो निश्चित रूप से उनसे बेहतर थे।

फ़ायदे

  • इस हदीस में मुसीबत के समय धैर्य न खोने और सब्र से काम लेने का आदेश दिया गया है।
  • मुसीबत के समय अल्लाह से दुआ करनी चाहिए, क्योंकि उसके पास हर चीज़ का बदल मौजूद है।
  • अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के आदेश का पालन करना ज़रूरी है, यद्यपि उसकी हिकमत समझ में न भी आए।
  • सारी भलाई अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के आदेश के अनुपालन में है।

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إنَّ لِلَّه ما أَخَذ ولَهُ ما أَعطَى، وكلُّ شَيءٍ عِنده بِأجَل مُسمَّى فَلتَصبِر ولتَحتَسِب

अनुवाद और हवाला

उसामा बिन ज़ैद बिन हारिस (रज़ियल्लाहु अन्हुमा) से रिवायत है, वह कहते हैं कि नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) की एक बेटी ने आपके पास संदेश भेजा कि मेरा बेटा मृत्यु के समीप है। अतः आप पधारें। चुनांचे आपने उनको सलाम भेजा तथा फरमायाः "बेशक अल्लाह ही के लिए है, जो उसने ले लिया और उसी का है, जो उसने दिया। उसके समीप प्रत्येक वस्तु का समय निश्चित है। अतः अब तू सब्र कर तथा अल्लाह से प्रतिफल की उम्मीद रख।" परन्तु आपकी बेटी ने फिर क़सम देते हुए संदेश भेजा की आप अवश्य आएँ। सो आप उठे। आपके साथ साद बिन उबादा, मुआज़ बिन जबल, उबय बिन काब, ज़ैद बिन साबित तथा कुछ और लोग (रज़ियल्लाहु अंहुम) भी थे। आप (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) की ओर बच्चे को बढ़ाया गया और आपने उसको अपनी गोद में बिठाया, तो उसकी साँसें उखड़ रही थीं। यह देख, आपकी आँखों में आँसू आ गए। इसपर साद (रज़ियल्लाहु अंहु) ने कहाः ऐ अल्लाह के रसूल, यह क्या है? आपने फरमायाः "यह रहमत है, जिसे अल्लाह ने अपने बंदों के दिलों में डाल दिया है।" तथा एक रिवायत में हैः "अपने जिस बंदे के दिल में चाहा, डाल दिया। तथा अल्लाह अपने उन्हीं बंदों पर रहम करता है, जो दूसरों पर रहम करते हैं।"

इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया है। दर्जा: सह़ीह़

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अनुवाद और हवाला

अनस बिन मालिक (रज़ियल्लाहु अंहु) का वर्णन है कि अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) अपने बेटे इबराहीम के पास उस समय आए, जब वह प्राण त्याग रहे थे। अतः, अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) की आँखों से आँसू जारी हो गए। यह देख अब्दुर्रहमान बिन औफ़ ने कहाः ऐ अल्लाह के रसूल, आप भी आँसू बहा रहे हैं? तो आपने फ़रमायाः "ऐ औफ़ के बेटे, यह दया है।" फिर आगे फ़रमायाः "आँखें आँसू बहा रही हैं और दिल शोकाकुुल है, लेकिन हम वही कहते हैं, जो हमारे रब को पसंद हो और ऐ इबराहीम, हम तेरी जुदाई से दुखी हैं।"

इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया है। दर्जा: सह़ीह़

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अनुवाद और हवाला

अनस बिन मालिक (रज़ियल्लाहु अन्हु) से रिवायत है, वह कहते हैं कि नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) एक स्त्री के पास से गु़जरे, जो क़ब्र के पास बैठकर रो रही थी। आपने फरमायाः "अल्लाह का तक़वा अख़्तियार कर तथा सब्र कर।" उसने ऊत्तर दियाः आप मुझसे दूर रहें, मुझ जैसी मुसीबत का सामना न तो आपने किया है और न आप उसे जानते हैं! उसके बाद उसको बताया गया कि यह नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) हैं, तो वह नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) के द्वार पर आई और वहाँ उसे दरबान नहीं मिले, (जो उसे आपके पास जाने से रोकते। अतः, वह आपके पास आई और) बोलीः मैं आपको पहचान नहीं पाई थी। आपने फरमायाः "सब्र तो मुसीबत के शुरू में करना होता है।"

इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया है। दर्जा: सह़ीह़

सवाल

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