Kutiba 'alaykumus-siyam

अनुवाद: Hindi Translation - Azizul Haq Al-Omari

يَٰٓأَيُّهَا ٱلَّذِينَ ءَامَنُواْ كُتِبَ عَلَيۡكُمُ ٱلصِّيَامُ كَمَا كُتِبَ عَلَى ٱلَّذِينَ مِن قَبۡلِكُمۡ لَعَلَّكُمۡ تَتَّقُونَ ١٨٣

ऐ ईमान वालो! तुमपर रोज़ा100 रखना फ़र्ज़ (अनिवार्य) कर दिया गया है, जैसे उन लोगों पर फ़र्ज़ (अनिवार्य) किया गया जो तुमसे पहले थे, ताकि तुम परहेज़गार बन जाओ।

फ़ुटनोट

100 रोज़ा को अरबी भाषा में "सौम" कहा जाता है, जिसका अर्थ रुकना तथा त्याग देना है। इस्लाम में रोज़ा सन् 2 हिजरी में अनिवार्य किया गया। जिसका अर्थ है प्रत्यूष (भोर) से सूर्यास्त तक रोज़े की नीयत से खाने पीन तथा संभोग आदि चीजों से रुक जाना।

तफ़सीर

ऐ अल्लाह पर ईमान लाने वालो और उसके रसूल का अनुसरण करने वालो! तुमपर तुम्हारे पालनहार की ओर से रोज़ा रखना फ़र्ज़ कर दिया गया है, जैसे तुमसे पहले समुदायों पर फ़र्ज़ किया गया था; ताकि तुम अल्लाह से डरो। अर्थात् अपने और उसके दंड के बीच अच्छे कर्मों को बचाव का साधन बना लो, और उनमें से एक महान कार्य रोज़ा रखना है।

أَيَّامٗا مَّعۡدُودَٰتٖۚ فَمَن كَانَ مِنكُم مَّرِيضًا أَوۡ عَلَىٰ سَفَرٖ فَعِدَّةٞ مِّنۡ أَيَّامٍ أُخَرَۚ وَعَلَى ٱلَّذِينَ يُطِيقُونَهُۥ فِدۡيَةٞ طَعَامُ مِسۡكِينٖۖ فَمَن تَطَوَّعَ خَيۡرٗا فَهُوَ خَيۡرٞ لَّهُۥۚ وَأَن تَصُومُواْ خَيۡرٞ لَّكُمۡ إِن كُنتُمۡ تَعۡلَمُونَ ١٨٤

गिने हुए चंद दिनों में। फिर तुममें से जो बीमार हो, अथवा किसी यात्रा पर हो, तो दूसरे दिनों से गिनती पूरी करना है। और जो लोग इसकी शक्ति रखते हों (परंतु रोज़ा न रखें), उनपर फ़िदया एक निर्धन का खाना है।101 फिर जो व्यक्ति स्वेच्छा से नेकी करे, तो वह उसके लिए बेहतर है। और तुम्हारा रोज़ा रखना तुम्हारे लिए बेहतर है, यदि तुम जानते हो।

फ़ुटनोट

101 यदि कोई अधिक बुढ़ापे अथवा ऐसे रोग के कारण जिससे आरोग्य होने की आशा न हो, रोज़ा रखने में अक्षम हो, तो प्रत्येक रोज़े के बदले एक निर्धन को खाना खिला दिया करे।

तफ़सीर

तुमपर अनिवार्य किया गया रोज़ा यह है कि तुम वर्ष में कुछ दिनों के रोज़े रखो। तुममें से जो कोई ऐसी बीमारी से पीड़ित है जिसके साथ रोज़ा रखना मुश्किल है, या वह एक यात्री है; तो उसके लिए रोज़ा तोड़ देना अनुमेय है, फिर वह उतने दिनों की क़ज़ा करेगा जिनके रोज़े उसने तोड़ दिए हैं। तथा जो लोग रोज़ा रखने की शक्ति रखते हैं, यदि वे रोज़ा तोड़ दें, तो उनपर फ़िदया अनिवार्य है, जो कि हर उस दिन के बदले जिसका वे रोज़ा तोड़ देते हैं, एक ग़रीब व्यक्ति को खाना खिलाना है। परंतु जो व्यक्ति एक से अधिक गरीबों को खाना खिलाए, या रोज़ा रखने के साथ खाना (भी) खिलाए, तो यह उसके लिए बेहतर है। हालाँकि, तुम्हारा रोज़ा रखना तुम्हारे लिए रोज़ा तोड़कर फ़िदया देने से बेहतर है, यदि तुम जानते हो कि रोज़े के क्या गुण हैं। ज्ञात होना चाहिए कि जब अल्लाह ने पहले पहल रोज़ा धर्मसंगत किया था, तो यही हुक्म था। चुनाँचे जो चाहता, रोज़ा रखता और जो चाहता, रोज़ा तोड़ देता और (उसके बदले) खाना खिलाता। फिर उसके बाद, अल्लाह ने रोज़े को अनिवार्य कर दिया और उसे हर व्यस्क (बालिग़) सक्षम व्यक्ति पर फ़र्ज़ क़रार दिया।

شَهۡرُ رَمَضَانَ ٱلَّذِيٓ أُنزِلَ فِيهِ ٱلۡقُرۡءَانُ هُدٗى لِّلنَّاسِ وَبَيِّنَٰتٖ مِّنَ ٱلۡهُدَىٰ وَٱلۡفُرۡقَانِۚ فَمَن شَهِدَ مِنكُمُ ٱلشَّهۡرَ فَلۡيَصُمۡهُۖ وَمَن كَانَ مَرِيضًا أَوۡ عَلَىٰ سَفَرٖ فَعِدَّةٞ مِّنۡ أَيَّامٍ أُخَرَۗ يُرِيدُ ٱللَّهُ بِكُمُ ٱلۡيُسۡرَ وَلَا يُرِيدُ بِكُمُ ٱلۡعُسۡرَ وَلِتُكۡمِلُواْ ٱلۡعِدَّةَ وَلِتُكَبِّرُواْ ٱللَّهَ عَلَىٰ مَا هَدَىٰكُمۡ وَلَعَلَّكُمۡ تَشۡكُرُونَ ١٨٥

रमज़ान का महीना वह है, जिसमें क़ुरआन उतारा गया, जो लोगों के लिए मार्गदर्शन है तथा मार्गदर्शन और (सत्य एवं असत्य के बीच) अंतर करने के स्पष्ट प्रमाण हैं। अतः तुममें से जो व्यक्ति इस महीने में उपस्थित102 हो, तो वह इसका रोज़ा रखे। तथा जो बीमार103 हो अथवा किसी यात्रा104 पर हो, तो दूसरे दिनों से गिनती पूरी करना है। अल्लाह तुम्हारे साथ आसानी चाहता है, तुम्हारे साथ तंगी नहीं चाहता। और ताकि तुम गिनती पूरी करो और ताकि तुम इस बात पर अल्लाह की महिमा का वर्णन करो कि उसने तुम्हें मार्गदर्शन प्रदान किया और ताकि तुम उसका शुक्र अदा करो।105

फ़ुटनोट

102 अर्थात अपने नगर में उपस्थित हो।

103 अर्थात रोग के कारण रोज़े न रख सकता हो।

104 अर्थात इतनी दूर की यात्रा पर हो जिसमें रोज़ा न रखने की अनुमति हो।

105 इस आयत में रोज़े की दशा तथा गिनती पूरी करने पर प्रार्थना करने की प्रेरणा दी गयी है।

तफ़सीर

रमज़ान का महीना वह है, जिसकी सम्मानित रात (लैलतुल क़द्र) में नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम पर पवित्र क़ुरआन उतरना शुरू हुआ। अल्लाह ने इसे लोगों के लिए मार्गदर्शन के रूप में उतारा है। इसमें मार्गदर्शन तथा सत्य और असत्य के बीच अंतर करने के स्पष्ट प्रमाण हैं। अतः जो व्यक्ति रमज़ान के महीने में उपस्थित हो, इस हाल में कि वह स्वस्थ एवं निवासी हो (यात्रा पर न हो), तो वह अनिवार्य रूप से उसका रोज़ा रखे। तथा जो व्यक्ति ऐसी बीमारी से पीड़ित हो कि उसके लिए रोज़ा रखना कठिन हो, या वह मुसाफ़िर हो; तो उसके लिए रोज़ा न रखना अनुमेय है। यदि वह रोज़ा न रखे, तो उसके लिए अनिवार्य है कि (बाद में) उन दिनों की क़ज़ा करे जिनके रोज़े उसने नहीं रखे थे। अल्लाह के इन विधानों का मक़सद तुम्हारे लिए आसानी पैदा करना है, न कि कठिनाई। और ताकि तुम पूरे महीने के रोज़े की गिनती पूरी करो और ताकि रमज़ान का महीना समाप्त होने के बाद तथा ईद के दिन इस बात पर अल्लाह की महिमा का वर्णन करो कि उसने तुम्हें इसका रोज़ा रखने का सामर्थ्य दिया और उसे पूरा करने पर तुम्हारी मदद की, और ताकि तुम अल्लाह का इस धर्म के लिए तुम्हारा मार्गदर्शन करने पर शुक्रिया अदा करो, जिसे उसने तुम्हारे लिए पसंद किया है।

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सवाल-जवाब

Kutiba 'alaykumus-siyam क़ुरआन में कहां है?

Kutiba 'alaykumus-siyam सूरह Al-Baqarah, 2:183-185 में है।