ٱلۡمُنَٰفِقُونَ وَٱلۡمُنَٰفِقَٰتُ بَعۡضُهُم مِّنۢ بَعۡضٖۚ يَأۡمُرُونَ بِٱلۡمُنكَرِ وَيَنۡهَوۡنَ عَنِ ٱلۡمَعۡرُوفِ وَيَقۡبِضُونَ أَيۡدِيَهُمۡۚ نَسُواْ ٱللَّهَ فَنَسِيَهُمۡۚ إِنَّ ٱلۡمُنَٰفِقِينَ هُمُ ٱلۡفَٰسِقُونَ ٦٧
मुनाफ़िक़ पुरुष और मुनाफिक़ स्त्रियाँ, वे सब एक-जैसे हैं। वे बुराई का आदेश देते हैं तथा भलाई से रोकते हैं और अपने हाथ बंद रखते31 हैं। वे अल्लाह को भूल गए, तो उसने उन्हें भुला32 दिया। निश्चय मुनाफ़िक़ लोग ही अवज्ञाकारी हैं।
फ़ुटनोट
31 अर्थात दान नहीं करते।
32 अल्लाह के भुला देने का अर्थ है उनपर दया न करना।
तफ़सीर
मुनाफ़िक़ पुरुष और महिलाएँ, सबके सब निफ़ाक़ की स्थितियों में एक जैसे हैं, और वे मोमिनों के विपरीत हैं। वे बुराई का आदेश देते हैं, भलाई से रोकते हैं और अपने धन में कंजूसी करते हैं। इसलिए वे उसे अल्लाह के रास्ते में खर्च नहीं करते हैं। उन्होंने अल्लाह की आज्ञा का पालन करना छोड़ दिया, तो अल्लाह ने भी उन्हें अपनी तौफ़ीक़ से वंचित कर दिया। निश्चय मुनाफ़िक़ लोग ही अल्लाह के आज्ञापालन और सत्य के मार्ग से निकलकर उसकी अवज्ञा और गुमराही के मार्ग की ओर जाने वाले हैं।