۞ فَمَا لَكُمۡ فِي ٱلۡمُنَٰفِقِينَ فِئَتَيۡنِ وَٱللَّهُ أَرۡكَسَهُم بِمَا كَسَبُوٓاْۚ أَتُرِيدُونَ أَن تَهۡدُواْ مَنۡ أَضَلَّ ٱللَّهُۖ وَمَن يُضۡلِلِ ٱللَّهُ فَلَن تَجِدَ لَهُۥ سَبِيلٗا ٨٨
तुम्हें क्या हो गया है कि मुनाफ़िक़ों के बारे में दो पक्ष60 बन गए हो, जबकि अल्लाह ने उनकी करतूतों के कारण उन्हें उल्टा फेर दिया है? क्या तुम उसे सही रास्ता दिखाना चाहते हो, जिसे अल्लाह ने पथभ्रष्ट कर दिया है? और जिसे अल्लाह पथभ्रष्ट कर दे, तुम उसके लिए कदापि कोई रास्ता नहीं पाओगे।
फ़ुटनोट
60 मक्का वासियों में कुछ अपने स्वार्थ के लिए मौखिक मुसलमान हो गए थे, और जब युद्ध आरंभ हुआ तो उनके बारे में मुसलमानों के दो विचार हो गए। कुछ उन्हें अपना मित्र और कुछ उन्हें अपना शत्रु समझ रहे थे। अल्लाह ने यहाँ बता दिया कि वे लोग मुनाफ़िक़ हैं। जब तक मक्का से हिजरत करके मदीना में न आ जाएँ, और शत्रु ही के साथ रह जाएँ, उन्हें भी शत्रु समझा जाएगा। ये वह मुनाफ़िक़ नहीं हैं जिनकी चर्चा पहले की गई है, ये मक्का के विशेष मुनाफ़िक़ हैं, जिनसे युद्ध की स्थिति में कोई मित्रता की जा सकती थी, और न ही उनसे कोई संबंध रखा जा सकता था।
तफ़सीर
(मोमिनो!) तुम्हें क्या हो गया है कि तुम, मुनाफ़िक़ों के साथ व्यवहार के बारे में दो अलग-अलग पक्ष बन गए हो : एक पक्ष कहता है कि उनके कुफ़्र के कारण उनसे युद्ध करना चाहिए, तथा दूसरा पक्ष कहता है कि उनके ईमान लाने के कारण उनसे युद्ध नहीं करना चाहिए?! तुम्हें उनके बारे में मतभेद में नहीं पड़ना चाहिए, जबकि अल्लाह ने उनके बुरे कर्मों के कारण उन्हें कुफ़्र और गुमराही की ओर लौटा दिया है। क्या तुम उसे सीधी राह पर लगाना चाहते हो, जिसे अल्लाह ने सत्य को स्वीकार करने का सामर्थ्य नहीं दिया है? और जिसे अल्लाह पथभ्रष्ट कर दे, तुम्हें उसे मार्गदर्शन करने का कोई रास्ता नहीं मिलेगा।