सूरह An-Nisa, आयत 83

4:83

وَإِذَا جَآءَهُمۡ أَمۡرٞ مِّنَ ٱلۡأَمۡنِ أَوِ ٱلۡخَوۡفِ أَذَاعُواْ بِهِۦۖ وَلَوۡ رَدُّوهُ إِلَى ٱلرَّسُولِ وَإِلَىٰٓ أُوْلِي ٱلۡأَمۡرِ مِنۡهُمۡ لَعَلِمَهُ ٱلَّذِينَ يَسۡتَنۢبِطُونَهُۥ مِنۡهُمۡۗ وَلَوۡلَا فَضۡلُ ٱللَّهِ عَلَيۡكُمۡ وَرَحۡمَتُهُۥ لَٱتَّبَعۡتُمُ ٱلشَّيۡطَٰنَ إِلَّا قَلِيلٗا ٨٣

और जब उनके पास सुरक्षा या भय की कोई सूचना आती है, तो उसे चारों ओर फैला देते हैं। हालाँकि, यदि वे उसे अल्लाह के रसूल तथा अपने में से प्राधिकारियों की ओर लौटा देते, तो उनमें से जो लोग उसका सही निष्कर्ष निकाल सकते हैं, उसकी वास्तविकता को अवश्य जान लेते। और यदि तुमपर अल्लाह की अनुकंपा तथा दया न होती, तो तुममें से कुछ को छोड़कर, सब शैतान का अनुसरण करने लगते।58

फ़ुटनोट

58 इस आयत द्वारा यह निर्देश दिया जा रहा है कि जब भी साधारण शांति या भय की कोई सूचना मिले तो उसे अधिकारियों तथा शासकों तक पहुँचा दिया जाए।

तफ़सीर

जब इन मुनाफ़िक़ों के पास मुसलमानों की सुरक्षा और ख़ुशी, या उनके डर और दुःख की कोई सूचना आती है, तो उसे फैला देते और प्रकाशित कर देते हैं। यदि वे धीरज धरते और उस मामले को रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की ओर तथा सोच-विचार, ज्ञान एवं शुभचिंतन वाले लोगों की तरफ़ लौटा देते, तो सोच-विचार करने और निष्कर्ष निकालने वाले लोग इस बात को अवश्य जान लेते कि उसे प्रकाशित करना चाहिए या गोपनीय रखना चाहिए। और - ऐ मोमिनो! - अगर इस्लाम के साथ तुमपर अल्लाह की अनुकंपा और क़ुरआन के साथ तुमपर उसकी दया न होती कि उसने तुम्हें उस दुर्दशा से सुरक्षित रखा जिससे इन मुनाफ़िक़ों को पीड़ित किया है; तो तुममें से कुछ को छोड़कर, सब शैतान के बहकावे में आ जाते।