सूरह An-Nisa, आयत 60

4:60

أَلَمۡ تَرَ إِلَى ٱلَّذِينَ يَزۡعُمُونَ أَنَّهُمۡ ءَامَنُواْ بِمَآ أُنزِلَ إِلَيۡكَ وَمَآ أُنزِلَ مِن قَبۡلِكَ يُرِيدُونَ أَن يَتَحَاكَمُوٓاْ إِلَى ٱلطَّٰغُوتِ وَقَدۡ أُمِرُوٓاْ أَن يَكۡفُرُواْ بِهِۦۖ وَيُرِيدُ ٱلشَّيۡطَٰنُ أَن يُضِلَّهُمۡ ضَلَٰلَۢا بَعِيدٗا ٦٠

(ऐ नबी!) क्या आपने उन लोगों को नहीं देखा, जिनका यह दावा है कि जो कुछ आपकी ओर उतारा गया है और जो कुछ आपसे पहले उतारा गया है उसपर वे ईमान रखते हैं, किंतु वे चाहते हैं कि अपने विवाद के निर्णय के लिए ताग़ूत (अल्लाह की शरीयत के अलावा से फैसला करने वाले) के पास जाएँ, जबकि उन्हें उस (ताग़ूत) का इनकार करने का आदेश दिया गया है? और शैतान चाहता है कि उन्हें सच्चे धर्म से बहुत दूर45 कर दे।

फ़ुटनोट

45 आयत का भावार्थ यह है कि जो धर्म विधान क़ुरआन तथा सुन्नत के सिवा किसी अन्य विधान से अपना निर्णय चाहते हों, उनका ईमान का दावा मिथ्या है।

तफ़सीर

(ऐ रसूल!) क्या आपने उन मुनाफ़िक़ यहूदियों का विरोधाभास नहीं देखा, जो झूठा दावा करते हैं कि वे उसपर ईमान रखते हैं जो कुछ आप पर अवतरित किया गया है और जो कुछ आपसे पूर्व रसूलों पर अवतिरत किया गया था। परंतु वे अपने विवादों में फैसले के लिए अल्लाह की शरीयत को छोड़कर मानव निर्मित क़ानून के पास जाना पसंद करते हैं। जबकि उन्हें आदेश दिया गया था कि वे उसका इनकार करें। और शैतान तो यह चाहता है कि उन्हें सत्य से इतना दूर कर दे कि वे उसके चलते मार्गदर्शन न पा सकें।