सूरह An-Nahl, आयत 76

16:76

وَضَرَبَ ٱللَّهُ مَثَلٗا رَّجُلَيۡنِ أَحَدُهُمَآ أَبۡكَمُ لَا يَقۡدِرُ عَلَىٰ شَيۡءٖ وَهُوَ كَلٌّ عَلَىٰ مَوۡلَىٰهُ أَيۡنَمَا يُوَجِّههُّ لَا يَأۡتِ بِخَيۡرٍ هَلۡ يَسۡتَوِي هُوَ وَمَن يَأۡمُرُ بِٱلۡعَدۡلِ وَهُوَ عَلَىٰ صِرَٰطٖ مُّسۡتَقِيمٖ ٧٦

तथा अल्लाह ने एक (और) उदाहरण31 दिया है; दो व्यक्ति हैं। जिनमें से एक गूँगा है। वह कुछ करने की योग्यता नहीं रखता और वह अपने मालिक पर बोझ है। वह उसे जहाँ भी भेजता है, कोई भलाई लेकर नहीं आता। तो क्या यह और वह व्यक्ति बराबर हैं, जो न्याय का आदेश देता है और वह (स्वयं) सीधे मार्ग पर है?

फ़ुटनोट

31 यह दूसरा उदाहरण है जो मूर्तियों का दिया है। जो गूँगी-बहरी होती हैं।

तफ़सीर

अल्लाह ने उनके तर्क के खंडन के लिए एक और उदाहरण दिया है, जो दो आदमियों का उदाहरण है : उनमें से एक गूँगा है। जो अपने बहरेपन और गूँगेपन के कारण, न सुनता है, न बोलता है और न समझता है। वह खुद को और दूसरों को लाभ पहुँचाने में अक्षम है, तथा वह अपने अभिभावक पर एक भारी बोझ है। वह उसे जहाँ भी भेजता है, कोई भलाई लेकर नहीं आता और न किसी अपेक्षित चीज़ को प्राप्त करने में सफल होता है। क्या जिसकी यह स्थिति है, उसके बराबर हो सकता है, जो अच्छी तरह सुनने और बोलने वाला है, तथा उसका लाभ दूसरों तक पहुँचने वाला है। क्योंकि वह लोगों को न्याय करने का आदेश देता है, और वह अपने आप में सदाचारी है। अतः वह एक स्पष्ट मार्ग पर है, जिसमें कोई संदेह और टेढ़ापन नहीं है?! तो भला तुम (ऐ बहुदेववादियो!) अल्लाह को, जो महिमा और पूर्णता के गुणों से विशिष्ट है, अपनी उन मूर्तियों के बराबर कैसे बनाते हो, जो न सुन सकती हैं, न बोल सकती हैं और न कोई लाभ पहुँचा सकती हैं और न कोई हानि दूर कर सकती हैं?!