ءَأَشۡفَقۡتُمۡ أَن تُقَدِّمُواْ بَيۡنَ يَدَيۡ نَجۡوَىٰكُمۡ صَدَقَٰتٖۚ فَإِذۡ لَمۡ تَفۡعَلُواْ وَتَابَ ٱللَّهُ عَلَيۡكُمۡ فَأَقِيمُواْ ٱلصَّلَوٰةَ وَءَاتُواْ ٱلزَّكَوٰةَ وَأَطِيعُواْ ٱللَّهَ وَرَسُولَهُۥۚ وَٱللَّهُ خَبِيرُۢ بِمَا تَعۡمَلُونَ ١٣
क्या तुम इससे डर गए कि अपनी गुप्त रूप से बात-चीत से पहले कुछ दान करो? सो, जब तुमने ऐसा नहीं किया और अल्लाह ने तुम्हें क्षमा कर दिया, तो नमाज़ कायम करो तथा ज़कात दो और अल्लाह तथा उसके रसूल की आज्ञा का पालन करो और तुम जो कुछ करते हो, अल्लाह उससे पूरी तरह अवगत है।
तफ़सीर
क्या तुम रसूल से सरगोशी करने से पहले सदक़ा देने के कारण गरीबी से डर गए? सो, यदि तुमने अल्लाह के इस आदेश का पालन नहीं किया, और अल्लाह ने तुम्हें क्षमा कर दिया कि इसे छोड़ने की छूट प्रदान कर दी, तो अब तुम उत्तम तरीक़े से नमाज़ क़ायम करो, अपने धन की ज़कात दो, तथा अल्लाह एवं उसके रसूल का अनुसरण करो। अल्लाह तुम्हारे कार्यों से पूरी तरह अवगत है। उससे तुम्हारा कोई काम छिपा नहीं है। और वह तुम्हें तुम्हारे कर्मों का बदला देगा।