۞ يَٰٓأَيُّهَا ٱلرَّسُولُ لَا يَحۡزُنكَ ٱلَّذِينَ يُسَٰرِعُونَ فِي ٱلۡكُفۡرِ مِنَ ٱلَّذِينَ قَالُوٓاْ ءَامَنَّا بِأَفۡوَٰهِهِمۡ وَلَمۡ تُؤۡمِن قُلُوبُهُمۡۛ وَمِنَ ٱلَّذِينَ هَادُواْۛ سَمَّٰعُونَ لِلۡكَذِبِ سَمَّٰعُونَ لِقَوۡمٍ ءَاخَرِينَ لَمۡ يَأۡتُوكَۖ يُحَرِّفُونَ ٱلۡكَلِمَ مِنۢ بَعۡدِ مَوَاضِعِهِۦۖ يَقُولُونَ إِنۡ أُوتِيتُمۡ هَٰذَا فَخُذُوهُ وَإِن لَّمۡ تُؤۡتَوۡهُ فَٱحۡذَرُواْۚ وَمَن يُرِدِ ٱللَّهُ فِتۡنَتَهُۥ فَلَن تَمۡلِكَ لَهُۥ مِنَ ٱللَّهِ شَيۡـًٔاۚ أُوْلَٰٓئِكَ ٱلَّذِينَ لَمۡ يُرِدِ ٱللَّهُ أَن يُطَهِّرَ قُلُوبَهُمۡۚ لَهُمۡ فِي ٱلدُّنۡيَا خِزۡيٞۖ وَلَهُمۡ فِي ٱلۡأٓخِرَةِ عَذَابٌ عَظِيمٞ ٤١
ऐ रसूल! वे लोग आपको शोकाकुल न करें, जो कुफ़्र में दौड़कर जाते हैं, उन लोगों में से जिन्होंने अपने मुँह से कहा कि हम ईमान लाए, हालाँकि उनके दिल ईमान नहीं लाए और उन लोगों में से जो यहूदी बने। बहुत सुनने वाले हैं झूठ को, बहुत सुनने वाले हैं दूसरे लोगों के लिए जो आपके पास नहीं आए, वे शब्दों को उनके स्थानों के बाद फेर देते हैं। वे कहते हैं : यदि तुम्हें यह दिया जाए तो ले लो, और यदि तुम्हें यह न दिया जाए, तो बचकर रहो। और जिसे अल्लाह अपनी परीक्षा में डालना चाहे, तो उसे (ऐ रसूल!) आप अल्लाह से बचाने के लिए कुछ नहीं कर सकते। ये वे लोग हैं कि अल्लाह ने नहीं चाहा कि उनके दिलों को पवित्र करे। उनके लिए दुनिया में अपमान है और उनके लिए आख़िरत में बहुत बड़ी यातना30 है।
फ़ुटनोट
30 मदीना के यहूदी विद्वान, मुनाफ़िक़ों को नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के पास भेजते कि आपकी बातें सुनें, और उन्हें सूचित करें। तथा अपने विवाद आपके पास ले जाएँ, और आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम कोई निर्णय करें तो हमारे आदेशानुसार हो तो स्वीकार करें, अन्यथा स्वीकार न करें। जबकि तौरात की आयतों में इनके आदेश थे, फिर भी वे उनमें परिवर्तन करके, उनका अर्थ कुछ का कुछ बना देते थे। ( देखिए व्याख्या आयत : 13)
तफ़सीर
ऐ रसूल! वे लोग आपको दुःखित न करें जो आपको क्रोधित करने के लिए कुफ़्र के कृत्यों को प्रकट करने में जल्दबाज़ी करते हैं, जो कि उन मुनाफ़िक़ों (पाखंडियों) में से हैं, जो ईमान को प्रदर्शित करते हैं और कुफ़्र को छिपाते हैं। इसी तरह वे यहूदी भी आपको दुखी न करें जो अपने बड़ों के झूठ को सुनते और उसे स्वीकार करते हैं, वे अपने उन नेताओं की नक़ल करते हैं, जो आपसे उपेक्षा करने के कारण आपके पास नहीं आए। ये लोग तौरात में मौजूद अल्लाह के शब्दों को अपनी इच्छाओं के अनुसार बदल देते हैं। वे अपने अनुयायियों से कहते हैं : यदि मुहम्मद का फैसला तुम्हारी इच्छाओं के अनुसार है, तो उसका अनुसरण करो और यदि वह उसके विरुद्ध हो, तो उससे सावधान रहना। तथा अल्लाह लोगों में से जिसे पथभ्रष्ट करना चाहे, तो (ऐ रसूल!) आप किसी ऐसे व्यक्ति को नहीं पाएँगे, जो उससे गुमराही को हटा सके और उसे सत्य के मार्ग पर ले जाए। इन विशेषताओं से विशेषित यहूदी और मुनाफ़िक़ वे लोग हैं, जिनके दिलों को अल्लाह ने कुफ़्र से पवित्र करना नहीं चाहा, उनके लिए इस दुनिया में अपमान और तिरस्कार है और आख़िरत में उनके लिए बहुत बड़ी यातना है, जो कि आग की यातना है।