أُوْلَٰٓئِكَ ٱلَّذِينَ يَدۡعُونَ يَبۡتَغُونَ إِلَىٰ رَبِّهِمُ ٱلۡوَسِيلَةَ أَيُّهُمۡ أَقۡرَبُ وَيَرۡجُونَ رَحۡمَتَهُۥ وَيَخَافُونَ عَذَابَهُۥٓۚ إِنَّ عَذَابَ رَبِّكَ كَانَ مَحۡذُورٗا ٥٧
जिन्हें ये (मुश्रिक) लोग33 पुकारते हैं, वे स्वयं अपने पालनहार की निकटता का साधन34 तलाश करते हैं कि उनमें से कौन (अल्लाह से) सबसे अधिक निकट हो जाए, तथा उसकी दया की आशा रखते हैं और उसकी यातना से डरते हैं। निःसंदेह आपके पालनहार की यातना डरने की चीज़ है।
फ़ुटनोट
33 अर्थात मुश्रिक जिन नबियों, महापुरुषों और फ़रिश्तों को पुकारते हैं।
34 साधन से अभिप्रेत सत्कर्म और आज्ञाकारिता है।
तफ़सीर
ये (बहुदेववादी) लोग जिन फरिश्तों और उन जैसों को पुकारते हैं, वे स्वयं उन अच्छे कार्यों की तलाश में रहते हैं, जो उन्हें अल्लाह के निकट कर दें तथा वे प्रतिस्पर्धा करते हैं कि उनमें से कौन आज्ञाकारिता के द्वारा अल्लाह के सबसे निकट हो जाए। तथा वे अल्लाह की दया की आशा रखते हैं और उसकी यातना से डरते हैं। निश्चित रूप से (ऐ रसूल) आपके पालनहार की यातना ऐसी है कि उससे डरना चाहिए।