مَّآ أَفَآءَ ٱللَّهُ عَلَىٰ رَسُولِهِۦ مِنۡ أَهۡلِ ٱلۡقُرَىٰ فَلِلَّهِ وَلِلرَّسُولِ وَلِذِي ٱلۡقُرۡبَىٰ وَٱلۡيَتَٰمَىٰ وَٱلۡمَسَٰكِينِ وَٱبۡنِ ٱلسَّبِيلِ كَيۡ لَا يَكُونَ دُولَةَۢ بَيۡنَ ٱلۡأَغۡنِيَآءِ مِنكُمۡۚ وَمَآ ءَاتَىٰكُمُ ٱلرَّسُولُ فَخُذُوهُ وَمَا نَهَىٰكُمۡ عَنۡهُ فَٱنتَهُواْۚ وَٱتَّقُواْ ٱللَّهَۖ إِنَّ ٱللَّهَ شَدِيدُ ٱلۡعِقَابِ ٧
अल्लाह ने जो कुछ भी इन बस्तियों वालों (के धन)4 से अपने रसूल पर लौटाया, तो वह अल्लाह के लिए और रसूल के लिए और (रसूल के) रिश्तेदारों, अनाथों, निर्धनों तथा यात्री के लिए है; ताकि वह (धन) तुम्हारे धनवानों ही के बीच चक्कर लगाता न रह जाए5, और रसूल तुम्हें जो कुछ दें, उसे ले लो और जिस चीज़ से रोक दें, उससे रुक जाओ। तथा अल्लाह से डरते रहो। निश्चय अल्लाह बहुत कड़ी यातना देने वाला है।
फ़ुटनोट
4 अर्थात यहूदी क़बीला बनी नज़ीर से जो धन बिना युद्ध के प्राप्त हुआ उसका नियम बताया गया है कि वह पूरा धन इस्लामी बैतुल-माल का होगा, उसे मुजाहिदों में विभाजित नहीं किया जाएगा। ह़दीस में है कि यह नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) के लिए विशिष्ट था, जिससे आप अपनी पत्नियों को ख़र्च देते थे। फिर जो बच जाता, तो उसे अल्लाह की राह में शस्त्र और सवारी में लगा देते थे। (बुख़ारी : 4885) इसको 'फ़य' का माल कहते हैं। जो ग़नीमत के माल से अलग है।
5 इसमें इस्लाम की अर्थ व्यवस्था के मूल नियम का वर्णन किया गया है। पूँजीवाद व्यवस्था में धन का प्रवाह सदा धनवानों की ओर होता है। और निर्धन दरिद्रता की चक्की में पिसता रहता है। कम्युनिज़्म में धन का प्रवाह सदा शासक वर्ग की ओर होता है। जबकि इस्लाम में धन का प्रवाह निर्धन वर्ग की ओर होता है।
तफ़सीर
अल्लाह ने अपने रसूल को बस्तियों वालों की संपत्ति में से जो कुछ बिना युद्ध किए दिया है, वह अल्लाह के लिए है, वह जिसे चाहे प्रदान करे, तथा उसके रसूल के लिए है जो उनके स्वामित्व में है, तथा बनी हाशिम और बनी मुत्तलिब में से आपके रिश्तेदारों के लिए है; उनके लिए उसके मुआवज़े के रूप में है जो उन्हें दान से रोक दिया गया है, तथा अनाथों के लिए, ग़रीबों के लिए और उस पथिक के लिए है जिसका खर्च समाप्त हो गया हो। यह आदेश इसलिए दिया गया है, ताकि ऐसा न हो कि धन केवल अमीरों के बीच घूमता रहे और ग़रीब लोग उससे वंचित रह जाएँ। और रसूल तुम्हें बिना युद्ध के प्राप्त होने वाले धन में से जो कुछ दें, उसे (ऐ ईमान वालो!) ले लो और जिससे तुम्हें रोक दें, उससे रुक जाओ। और अल्लाह से, उसके आदेशों का पालन करते हुए और उसके निषेधों से बचते हुए, डरते रहो। निश्चय अल्लाह बहुत कठोर सज़ा देने वाला है। अतः उसकी सज़ा से बचो।