لَّا جُنَاحَ عَلَيۡكُمۡ إِن طَلَّقۡتُمُ ٱلنِّسَآءَ مَا لَمۡ تَمَسُّوهُنَّ أَوۡ تَفۡرِضُواْ لَهُنَّ فَرِيضَةٗۚ وَمَتِّعُوهُنَّ عَلَى ٱلۡمُوسِعِ قَدَرُهُۥ وَعَلَى ٱلۡمُقۡتِرِ قَدَرُهُۥ مَتَٰعَۢا بِٱلۡمَعۡرُوفِۖ حَقًّا عَلَى ٱلۡمُحۡسِنِينَ ٢٣٦
तुमपर कोई पाप नहीं, यदि तुम स्त्रियों को तलाक़ दे दो जबकि तुमने (अभी) उन्हें न हाथ लगाया हो और न उनके लिए कुछ महर निर्धारित किया हो। (लेकिन) उन्हें रीति के अनुसार कुछ सामान दे दो; विस्तार वाले पर अपनी क्षमता के अनुसार तथा तंगदस्त पर अपनी क्षमता के अनुसार देय है। सत्कर्म करने वालों पर यह हक़ है।
तफ़सीर
जिन पत्नियों से तुमने निकाह किया है, यदि तुम उन्हें उनके साथ संभोग करने से पहले तथा उनके लिए एक विशिष्ट महर निर्धारित करने से पहले तलाक़ दे दो, तो तुमपर कोई पाप नहीं है। यदि तुम उन्हें इस स्थिति में तलाक़ देते हो, तो तुमपर उनके लिए कोई महर वाजिब नहीं होगी। लेकिन आदमी धनी हो या निर्धन उस पर यह ज़रूरी होगा कि अपनी क्षमता के अनुसार उन्हें कुछ दे दे, जिससे वे लाभ उठा सकें और उनके टूटे हुए दिल की सांत्वना हो जाए। यह देना उन लोगों पर एक निश्चित अधिकार है, जो अपने कार्यों और लेनदेन में सदाचारी हैं।