قُلۡ هُوَ ٱلۡقَادِرُ عَلَىٰٓ أَن يَبۡعَثَ عَلَيۡكُمۡ عَذَابٗا مِّن فَوۡقِكُمۡ أَوۡ مِن تَحۡتِ أَرۡجُلِكُمۡ أَوۡ يَلۡبِسَكُمۡ شِيَعٗا وَيُذِيقَ بَعۡضَكُم بَأۡسَ بَعۡضٍۗ ٱنظُرۡ كَيۡفَ نُصَرِّفُ ٱلۡأٓيَٰتِ لَعَلَّهُمۡ يَفۡقَهُونَ ٦٥
आप (उनसे) कह दें : वही इसका सामर्थ्य रखता है कि तुमपर तुम्हारे ऊपर से यातना भेज दे, या तुम्हारे पैरों के नीचे से, या तुम्हें विभिन्न समूह बनाकर परस्पर भिड़ा दे और तुममें से कुछ को कुछ की लड़ाई48 (का स्वाद) चखा दे। देखिए, हम कैसे आयतों को विभिन्न प्रकार से बयान करते हैं, ताकि वे समझें।
फ़ुटनोट
48 ह़दीस में है कि नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने अपनी उम्मत के लिए तीन दुआएँ कीं : मेरी उम्मत का विनाश डूब कर न हो। साधारण आकाल से न हो। और आपस की लड़ाई से न हो। तो पहली दो दुआएँ स्वीकार हूईं और तीसरी से आपको रोक दिया गया। (बुख़ारी : 2216)
तफ़सीर
(ऐ रसूल!) आप इनसे कह दें : अल्लाह ही इस बात का सामर्थ्य रखता है कि तुमपर ऐसी यातना भेज दे, जो पत्थर, वज्र और बाढ़ की तरह तुम्हारे पास तुम्हारे ऊपर से आए, या वह तुम्हारे पास तुम्हारे नीचे से आए जैसे भूकंप और धरती में धंसना, या वह तुम्हारे दिलों में द्वन्द्व (असहमति) पैदा कर दे, तो तुममें से हर व्यक्ति अपनी इच्छा का पालन करने लगे, फिर तुम एक-दूसरे से लड़ने लगो। (ऐ पैग़ंबर!) ग़ौर कीजिए कैसे हम उनके लिए प्रमाणों और सबूतों में विविधता लाते हैं और उन्हें स्पष्ट करते हैं ताकि वे समझ सकें कि जो कुछ आप लाए हैं, वह सच है और जो उनके पास है वह झूठा है।