सफ़र की दुआ और मुसाफ़िर की दुआएं

सफ़र पर निकलते वक़्त, रास्ते में और कहीं ठहरते वक़्त क्या कहें।

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سبحان الذي سخَّر لنا هذا وما كُنَّا له مُقْرِنِينَ وإنَّا إلى ربِّنا لـمُنْقَلِبُون، اللهم إنَّا نَسْأَلُك في سفرنا هذا البِرَّ والتَّقْوَى، ومن العمل ما تَرْضَى، اللهم هَوِّنْ علينا سفرنا هذا واطْوِ عنا بُعْدَه، اللهم أنت الصاحب في السفر، والخليفة في الأهل، اللهم إني أعوذ بك مِن وَعْثَاء السفر، وكآبة الـمَنْظر، وسوء الـمُنْقَلَب في المال والأهل والولد

अनुवाद और हवाला

अब्दुल्लाह बिन उमर (रज़ियल्लाहु अंहुमा) का वर्णन है कि अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) जब सफ़र में निकलते समय अपने ऊँट पर ठीक से बैठ जाते तो तीन बार 'अल्लाहु अकबर' कहते और फिर फ़रमातेः «سبحان الذي سخَّر لنا هذا وما كُنَّا له مُقْرِنِينَ وإنَّا إلى ربِّنا لـمُنْقَلِبُون، اللهم إنَّا نَسْأَلُك في سفرنا هذا البِرَّ والتَّقْوَى، ومن العمل ما تَرْضَى، اللهم هَوِّنْ علينا سفرنا هذا واطْوِ عنا بُعْدَه، اللهم أنت الصاحب في السفر، والخليفة في الأهل، اللهم إني أعوذ بك مِن وَعْثَاء السفر، وكآبة الـمَنْظر، وسوء الـمُنْقَلَب في المال والأهل والولد». وإذا رجع قالهن. وزاد فيهن «آيبون تائبون عابدون لِربنا حامدون» अर्थात, पाक है वह हस्ती, जिसने इस जानवर को हमारे वश में कर दिया, अन्यथा हम उसे अपने क़ाबू में करने पर सक्षम नहीं थे तथा निश्चय ही हम अपने रब की ओर लौटकर जाने वाले हैं। ऐ अल्लाह! हम तुझसे अपने इस सफ़र में नेकी, परहेज़गारी और ऐसा अमल माँगते हैं, जो तुझे पसंद हो। ऐ अल्लाह! हमारे इस सफ़र को हमारे लिए आसान कर दे तथा उसकी दूरी को लपेट दे। ऐ अल्लाह! तू ही सफ़र में साथी और घर वालों को संभालने वाला है। ऐ अल्लाह! मैं सफ़र की कठिनाई, दुखदायी दृश्य और वापसी पर माल, परिवार और संतान में बुरे परिवर्तन से तेरी शरण माँगता हूँ। इसी तरह, जब यात्रा से लौटते तो इन शब्दों को कहने के बाद यह इज़ाफ़ा भी करतेः «آيبون تائبون عابدون لِربنا حامدون», अर्थात, हम यात्रा से लौटने वाले हैं, तौबा करने वाले हैं, इबादत करने वाले हैं और अपने प्रभु की प्रशंसा करने वाले हैं।

तथा एक रिवायत मे हैः अल्लाह के नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) हज या उमरा से लौटते समय जब भी किसी पहाड़ी या ऊँचे स्थान पर चढ़ते तो तीन बार 'अल्लाहु अकबर' कहते, फिर फ़रमातेः «لا إله إلا الله وحده لا شريك له، له الملك وله الحمد، وهو على كل شيء قدير، آيِبون، تائبون، عابدون، ساجدون، لربنا حامدون، صدَق الله وَعْدَه، ونصَر عَبْدَه، وهزَم الأحزابَ وحده», अर्थात, अल्लाह के सिवा कोई सत्य पूज्य नहीं। वह अकेला है। उसका कोई साझी नहीं है। उसी का राज्य है और उसी की प्रशंसा है तथा वह हर चीज़ की शक्ति रखता है। हम लौटने वाले हैं, तौबा करने वाले हैं, इबादत करने वाले हैं, सजदा करने वाले हैं और अपने रब की प्रशंसा करने वाले हैं। अल्लाह ने अपना वादा सच कर दिखाया, अपने बंदे की मदद की और अकेले सारे समूहों को पराजित कर दिया। तथा एक रिवायत में हैः जब किसी बड़ी सेना, छोटे सैन्य-दल, हज या उमरा से लौटते (तो यह दुआ पढ़ते)।

इसे मुस्लिम ने रिवायत किया है। दर्जा: सह़ीह़

2 एक बार

अनुवाद और हवाला

अब्दुल्लाह बिन सरजिस (रज़ियल्लाहु अंहु) कहते हैं कि अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) जब किसी यात्रा पर निकलते तो यात्रा की कठिनाई, अप्रिय वापसी, बनाव के बाद बिगाड़, मज़लूम की बददुआ और परिवार तथा धन-माल में बुरी दृष्टि से अल्लाह की शरण माँगते थे।

इसे मुस्लिम ने रिवायत किया है। दर्जा: सह़ीह़

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अनुवाद और हवाला

जाबिर (रज़ियल्लाहु अनहु) कहते हैं कि जब हम किसी ऊँचे स्थान पर चढ़ते, तो अल्लाहु अकबर कहते और जब ढलान से उतरते, तो सुबहानल्लाह कहा करते थे। अब्दुल्लाह बिन उमर (रज़ियल्लाहु अनहुमा) कहते हैं कि अल्लाह के नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) और आप की सेना जब टीलों पर चढ़ते, तो तकबीर (अल्लाहु अकबर) कहते और जब उतरते, तो तसबीह (सुबहानल्लाह) पढ़ते थे।

इसे बुख़ारी ने रिवायत किया है। - इसे अबू दाऊद ने रिवायत किया है। दर्जा: दोनों रिवायतों को मिलाकर सह़ीह़

4 एक बार

अनुवाद और हवाला

अबू हुरैरा (रज़ियल्लाहु अनहु) का वर्णन है कि एक व्यक्ति ने कहाः ऐ अल्लाह के रसूल! मैं यात्रा में निकलना चाहता हूँ, अतः आप मुझे वसीयत करें। आपने कहाः अल्लाह का भय हरदम रखो और हर ऊँचाई पर चढ़ते समय 'अल्लाहु अकबर' कह लिया करो।जब वह व्यक्ति जाने लगा तो आपने फ़रमायाः "ऐ अल्लाह! उसके लिए दूरी को समेट दे और उसकी यात्रा को आसान कर दे।

इसे इब्ने माजा ने रिवायत किया है । - इसे तिर्मिज़ी ने रिवायत किया है। - इसे अह़मद ने रिवायत किया है। दर्जा: ह़सन

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أَعُوذُ بِكَلِمَاتِ اللهِ التَّامَّاتِ مِنْ شَرِّ مَا خَلَقَ

अनुवाद और हवाला

ख़ौला बिंत हकीम सुलमिया रज़ियल्लाहु अनहा से वर्णित है, उन्होंने कहा : मैंने अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम को कहते हुए सुना है : "जो किसी स्थान में उतरते समय कहे : 'मैं अल्लाह की पैदा की हुई चीज़ों की बुराई से उसके संपूर्ण शब्दों के द्वारा (उसकी) शरण माँगता हूँ', उसे कोई चीज़ वह स्थान छोड़ने तक नुक़सान नहीं पहुँचा सकती।"

इसे मुस्लिम ने रिवायत किया है दर्जा: स़ह़ीह़

शरह

अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम अपनी उम्मत को यात्रा या सैर व तफ़रीह के दौरान किसी स्थान में उतरते समय, अल्लाह की शरण लेने का निर्देश दे रहे हैं, जिससे इन्सान हर उस बुराई से सुरक्षित रह सकता है, जिसका उसे डर हो। आपने बताया कि बंदा जब किसी स्थान में उतरते समय हर बुराई वाली सृष्टि की बुराई से अल्लाह के ऐसे शब्दों के द्वारा शरण ले लेता है, जो फ़ज़ीलत, बरकत तथा लाभ के दृष्टिकोण से संपूर्ण हैं और हर ऐब तथा कमी से पाक हैं, तो वहाँ जब तक रुका रहता है, तब तक हर कष्टदायक वस्तु से सुरक्षित रहता है।

फ़ायदे

  • शरण लेना भी इबादत है। यानी अल्लाह या उसके नामों की शरण लेना या उसके गुणों द्वारा उसकी शरण लेना।
  • अल्लाह की वाणी के द्वारा शरण लेना जायज़ है। क्योंकि यह अल्लाह के गुणों में से एक गुण है। जबकि किसी सृष्टि की शरण लेना न सिरफ़ यह कि जायज़ नहीं है, बल्कि शिर्क है।
  • इस दुआ की फ़ज़ीलत तथा बरकत।
  • अपनी सुरक्षा के लिए अज़कार पढ़ने से अल्लाह बंदे को बुराइयों से सुरक्षित रखता है।
  • अल्लाह को छोड़ कर किसी और की, मसलन जिन्नों, जादूगरों और करतब दिखाने वालों की शरण लेने का खंडन।
  • यात्रा के दौरान या बिना यात्रा के कहीं उतरते समय इस दुआ को पढ़ना चाहिए।

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أَسْتَوْدِعُ الله دِينَكَ، وَأَمَانَتَكَ، وَخَوَاتِيمَ عَمَلِكَ

अनुवाद और हवाला

अब्दुल्लाह बिन उमर (रज़ियल्लाहु अन्हुमा) यात्रा पर निकलने वाले व्यक्ति से कहते थेः मेरे पास आओ, ताकि मैं तुम्हें उसी तरह विदा करूँ, जैसे अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) हमें विदा करते थे। आप फ़रमाते थेः "मैं तेरे धर्म, तेरी अमानत और तेरे अंतिम कर्मों को अल्लाह के हवाले करता हूँ।"

तथा अब्दुल्लाह बिन यज़ीद ख़तमी (रज़ियल्लाहु अंहु) कहते हैं कि अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) जब सेना को विदा करते, तो फ़रमातेः "मैं तुम्हारे धर्म, तुम्हारी अमानत और तुम्हारे अंतिम कर्मों को अल्लाह के हवाले करता हूँ।"

इसे इब्ने माजा ने रिवायत किया है । - इसे तिर्मिज़ी ने रिवायत किया है। - इसे नसाई ने रिवायत किया है। - इसे अबू दाऊद ने रिवायत किया है। - इसे अह़मद ने रिवायत किया है। दर्जा: सह़ीह़

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زَوَّدَكَ الله التقوى

अनुवाद और हवाला

अनस बिन मालिक- रज़ियल्लाहु अन्हु- कहते हैं एक व्यक्ति अल्लाह के नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) के पास आकर बोला कि ऐ अल्लाह के रसूल! मैं यात्रा पर निकलना चाहता हूँ। अतः, मुझे कुछ पाथेय प्रदान कीजिए। आपने कहाः अल्लाह तुझे धर्मपरायणता (तक़वा) का पाथेय प्रदान करे। उसने कहाः कुछ और प्रदान करें। तो फ़रमायाः तेरे गुनाह माफ़ कर दे। उसने कहाः और कुछ प्रदान करें। तो फ़रमायाः तू जहाँ भी रहे, अल्लाह तेरे लिए भलाई की राह आसान कर दे।

इसे तिर्मिज़ी ने रिवायत किया है। - इसे दारिमी ने रिवायत किया है। दर्जा: ह़सन ग़रीब

सवाल

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