لَوۡ كَانَ عَرَضٗا قَرِيبٗا وَسَفَرٗا قَاصِدٗا لَّٱتَّبَعُوكَ وَلَٰكِنۢ بَعُدَتۡ عَلَيۡهِمُ ٱلشُّقَّةُۚ وَسَيَحۡلِفُونَ بِٱللَّهِ لَوِ ٱسۡتَطَعۡنَا لَخَرَجۡنَا مَعَكُمۡ يُهۡلِكُونَ أَنفُسَهُمۡ وَٱللَّهُ يَعۡلَمُ إِنَّهُمۡ لَكَٰذِبُونَ ٤٢
यदि शीघ्र मिलने वाल सामान और मध्यम यात्रा होती, तो वे अवश्य आपके पीछे चल पड़ते, लेकिन फ़ासला उनपर दूर पड़ गया। और जल्द ही वे अल्लाह की क़समें खाएँगे कि अगर हमारे पास ताकत होती, तो हम तुम्हारे साथ अवश्य निकलते। वे अपने आपको नष्ट कर रहे हैं और अल्लाह जानता है कि वे निश्चित रूप से झूठे हैं।
तफ़सीर
यदि आप जिसकी ओर उन मुनाफ़िक़ों को बुला रहे थे, जिन्होंने आपसे पीछे रहने की अनुमति माँगी थी, आसानी से प्राप्त होने वाला ग़नीमत का धन और बिना कठिनाई का सफ़र होता, तो वे (ऐ नबी!) आपका अवश्य अनुसरण करते। लेकिन वह फ़ासला जो आपने उनको शत्रु के पास जाने के लिए तय करने को कहा था, उनसे बहुत दूर था, सो वे पीछे रह गए। और जब आप (युद्ध से) उनके पास लौटेंगे, तो ये पीछे रहने की अनुमति माँगने वाले मुनाफ़िक़ अल्लाह की क़समें खाकर कहेंगे : अगर हम आपके साथ जिहाद में निकलने की ताक़त रखते, तो हम ज़रूर निकलते। वे जिहाद से पीछे रहकर और इन झूठी क़समों के कारण, खुद को अल्लाह की सज़ा के लिए पेश करके, अपनी तबाही मोल ले रहे हैं। जबकि अल्लाह जानता है कि निश्चय वे अपने दावे और अपनी इन क़समों में झूठे हैं।