وَيَقُولُونَ ءَامَنَّا بِٱللَّهِ وَبِٱلرَّسُولِ وَأَطَعۡنَا ثُمَّ يَتَوَلَّىٰ فَرِيقٞ مِّنۡهُم مِّنۢ بَعۡدِ ذَٰلِكَۚ وَمَآ أُوْلَٰٓئِكَ بِٱلۡمُؤۡمِنِينَ ٤٧
और वे39 कहते हैं कि हम अल्लाह पर तथा रसूल पर ईमान लाए और हमने आज्ञापालन किया। फिर इसके बाद उनमें से एक गिरोह मुँह फेर लेता है। और ये लोग ईमान वाले नहीं हैं।
फ़ुटनोट
39 यहाँ से मुनाफ़िक़ों की दशा का वर्णन किया जा रहा है, तथा यह बताया जा रहा है कि ईमान के लिए अल्लाह के सभी आदेशों तथा नियमों का पालन आवश्यक है। और क़ुरआन तथा सुन्नत के निर्णय का पालन करना ही ईमान है।
तफ़सीर
मुनाफ़िक़ लोग कहते हैं : हम अल्लाह पर ईमान लाए और रसूल पर ईमान लाए, तथा हमने अल्लाह का आज्ञापालन किया और रसूल का आज्ञापालन किया। फिर उनमें से एक समूह मुँह फेर लेता है। चुनाँचे अल्लाह और उसके रसूल पर ईमान लाने और उनकी बात मानने का दावा करने के बाद, वे अल्लाह के मार्ग में जिहाद करने के आदेश में अल्लाह और उसके रसूल का पालन नहीं करते हैं। और ये अल्लाह और उसके रसूल के आज्ञापालन से मुँह फेरने वाले, मोमिन नहीं हैं, भले ही वे दावा करें कि वे मोमिन हैं।