وَقَالُواْ لَوۡ كُنَّا نَسۡمَعُ أَوۡ نَعۡقِلُ مَا كُنَّا فِيٓ أَصۡحَٰبِ ٱلسَّعِيرِ ١٠
तथा वे कहेंगे : यदि हम सुनते होते या समझते होते, तो भड़कती हुई आग वालों में न होते।
तफ़सीर
और काफ़िर कहेंगे : अगर हम उससे लाभान्वित होने के तौर पर सुनते होते, या ऐसे व्यक्ति के समझने की तरह समझते होते, जो सत्य एवं असत्य के बीच अंतर करता है, तो हम जहन्नम में दाख़िल होने वालों के बीच न होते। बल्कि, हम रसूलों पर ईमान रखते होते और उनके लाए हुए संदेश को सच मानते होते और जन्नत में प्रवेश करने वालों में से होते।