सूरह Al-Ma'idah, आयत 105

5:105

يَٰٓأَيُّهَا ٱلَّذِينَ ءَامَنُواْ عَلَيۡكُمۡ أَنفُسَكُمۡۖ لَا يَضُرُّكُم مَّن ضَلَّ إِذَا ٱهۡتَدَيۡتُمۡۚ إِلَى ٱللَّهِ مَرۡجِعُكُمۡ جَمِيعٗا فَيُنَبِّئُكُم بِمَا كُنتُمۡ تَعۡمَلُونَ ١٠٥

ऐ ईमान वालो! तुमपर अपनी चिंता अनिवार्य है। तुम्हें वह व्यक्ति हानि नहीं पहुँचाएगा, जो गुमराह हो गया, जब तुम मार्गदर्शन पा चुके। अल्लाह ही की ओर तुम सबको लौटकर जाना है। फिर वह तुम्हें बताएगा, जो कुछ तुम किया करते थे।71

फ़ुटनोट

71 आयत का भावार्थ यह है कि यदि लोग कुपथ हो जाएँ, तो उनका कुपथ होना तुम्हारे लिए तर्क (दलील) नहीं हो सकता कि जब सभी कुपथ हो रहे हैं तो हम अकेले क्या करें? प्रत्येक व्यक्ति पर स्वयं अपना दायित्व है, दूसरों का दायित्व उस पर नहीं है। अतः पूरा संसार कुपथ हो जाए, तब भी तुम सत्य पर स्थित रहो।

तफ़सीर

ऐ ईमान वालो! तुम अपनी चिंता करो। अतः अपने आपको ऐसा कार्य करने के लिए प्रतिबद्ध करो, जिससे तुम्हारा सुधार हो। यदि तुम स्वयं मार्गदर्शन पा चुके, तो लोगों में से जो व्यक्ति गुमराह हो गया और उसने तुम्हारी बात नहीं मानी, वह तुम्हें कोई हानि नहीं पहुँचाएगा। तथा तुम्हारे मार्गदर्शन प्राप्त होने की अपेक्षा यह कि तुम भलाई का आदेश दो और बुराई से रोको। क़ियामत के दिन तुम्हें अकेले अल्लाह ही की ओर लौटकर जाना है, फिर वह तुम्हें बताएगा कि तुम दुनिया में क्या किया करते थे और तुम्हें उसका बदला देगा।