وَإِنَّ مِنۡهُمۡ لَفَرِيقٗا يَلۡوُۥنَ أَلۡسِنَتَهُم بِٱلۡكِتَٰبِ لِتَحۡسَبُوهُ مِنَ ٱلۡكِتَٰبِ وَمَا هُوَ مِنَ ٱلۡكِتَٰبِ وَيَقُولُونَ هُوَ مِنۡ عِندِ ٱللَّهِ وَمَا هُوَ مِنۡ عِندِ ٱللَّهِۖ وَيَقُولُونَ عَلَى ٱللَّهِ ٱلۡكَذِبَ وَهُمۡ يَعۡلَمُونَ ٧٨
और निःसंदेह उनमें से निश्चय कुछ लोग40 ऐसे हैं, जो किताब (पढ़ने) के साथ अपनी ज़बानें मरोड़ते हैं, ताकि तुम उसे पुस्तक में से समझो, हालाँकि वह पुस्तक में से नहीं और कहते हैं, यह अल्लाह की ओर से है। हालाँकि वह अल्लाह की ओर से नहीं और अल्लाह पर झूठ कहते हैं, हालाँकि वे जानते हैं।
फ़ुटनोट
40 इससे अभिप्राय यहूदी विद्वान हैं। और पुस्तक से अभिप्राय तौरात है।
तफ़सीर
यहूदियों में से कुछ लोग ऐसे हैं, जो ऐसी बात का उल्लेख करते हुए जो अल्लाह की ओर से उतारी हुई तौरात में से नहीं है, अपनी ज़बान को मरोड़ते हैं, ताकि तुम्हें लगे कि वे तौरात पढ़ रहे हैं। हालाँकि वह तौरात का अंश नहीं, बल्कि उनके झूठ और अल्लाह पर मिथ्यारोपण से है। और वे कहते हैं : हम जो कुछ पढ़ रहे हैं, वह अल्लाह की ओर से उतारा हुआ है। हालाँकि वह अल्लाह की ओर से नहीं है। तथा वे अल्लाह के बारे में झूठ कहते हैं, जबकि वे अल्लाह और उसके रसूलों के बारे में अपने झूठ को जानते हैं।