وَكَأَيِّن مِّن قَرۡيَةٍ أَمۡلَيۡتُ لَهَا وَهِيَ ظَالِمَةٞ ثُمَّ أَخَذۡتُهَا وَإِلَيَّ ٱلۡمَصِيرُ ٤٨
और कितनी ही बस्तियाँ हैं, जिन्हें हमने अवसर दिया, जबकि वे अत्याचारी थीं। फिर मैंने उन्हें पकड़ लिया और मेरी ही ओर (सबको) लौटकर आना है।
तफ़सीर
और कितनी ही बस्तियाँ ऐसी हैं, जिन्हें मैंने यातना में मोहलत दी, जबकि वे अपने कुफ़्र के कारण अत्याचारी थीं, और उन्हें ढील देने के उद्देश्य से उन्हें दंडित करने में जल्दी नहीं की। फिर मैंने उन्हें विनाशकारी यातना से ग्रस्त कर दिया। और केवल मेरी ही ओर क़ियामत के दिन उन सब को लौटना है, फिर मैं उन्हें उनके कुफ़्र के कारण स्थायी यातना से ग्रस्त करूँगा।