إِلَّا ٱلَّذِينَ ءَامَنُواْ وَعَمِلُواْ ٱلصَّٰلِحَٰتِ وَتَوَاصَوۡاْ بِٱلۡحَقِّ وَتَوَاصَوۡاْ بِٱلصَّبۡرِ ٣
सिवाय उन लोगों के जो ईमान लाए तथा उन्होंने सत्कर्म किए और एक-दूसरे को सत्य की ताकीद की और एक-दूसरे को धैर्य की ताकीद की।2
फ़ुटनोट
2 इसका अर्थ यह है कि परलोक की क्षति से बचने के लिए मात्र ईमान ही पर बस नहीं, इसके लिए सदाचार भी आवश्यक है और उसमें से विशेष रूप से सत्य और सहनशीलता और दूसरों को इनकी शिक्षा देते रहना भी आवश्यक है। (तर्जुमानुल क़ुरआन, मौलाना आज़ाद)
तफ़सीर
परंतु जो लोग अल्लाह और उसके रसूलों पर ईमान लाए और अच्छे कार्य किए, तथा एक-दूसरे को सत्य की और सत्य पर धैर्य रखने की ताकीद की; तो इन विशेषताओं से सुसज्जित लोग अपने दुनिया एवं आखिरत के जीवन में सफल होने वाले हैं।