يَسۡـَٔلُونَكَ عَنِ ٱلۡأَنفَالِۖ قُلِ ٱلۡأَنفَالُ لِلَّهِ وَٱلرَّسُولِۖ فَٱتَّقُواْ ٱللَّهَ وَأَصۡلِحُواْ ذَاتَ بَيۡنِكُمۡۖ وَأَطِيعُواْ ٱللَّهَ وَرَسُولَهُۥٓ إِن كُنتُم مُّؤۡمِنِينَ ١
(ऐ नबी!) वे (आपके साथी) आपसे युद्ध में प्राप्त धन के विषय में पूछते हैं। आप कह दें कि युद्ध में प्राप्त धन अल्लाह और रसूल के हैं। अतः अल्लाह से डरो और आपस में सुधार रखो तथा अल्लाह और उसके रसूल की आज्ञा का पालन करो1, यदि तुम ईमान वाले हो।
फ़ुटनोट
1 नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने तेरह वर्ष तक मक्का के मिश्रणवादियों के अत्याचार सहन किए। फिर मदीना हिजरत कर गए। परंतु वहाँ भी मक्का वासियों ने आप को चैन नहीं लेने दिया। और निरंतर आक्रमण आरंभ कर दिए। ऐसी दशा में आप भी अपनी रक्षा के लिए वीरता के साथ अपने 313 साथियों को लेकर बद्र के रणक्षेत्र में पहुँचे। जिसमें मिश्रणवादियों की पराजय हुई। और कुछ सामान भी मुसलमानों के हाथ आया। जिसे इस्लामी परिभाषा में "माले-ग़नीमत" कहा जाता है। और उसी के विषय में प्रश्न का उत्तर इस आयत में दिया गया है। यह प्रथम युद्ध हिजरत के दूसरे वर्ष हुआ।
तफ़सीर
(ऐ रसूल!) आपके साथी आपसे ग़नीमतों (युद्ध में प्राप्त होने वाले धन) के विषय में पूछते हैं कि उन्हें कैसे विभाजित किया जाएगा? और किन लोगों में वितरण किया जाएगा? (ऐ रसूल!) उनके प्रश्न का उत्तर देते हुए कह दें : ग़नीमतें (युद्ध में प्राप्त धन) अल्लाह और उसके रसूल के लिए हैं और उन्हें खर्च करने और बाँटने के विषय में निर्णय का अधिकार अल्लाह और उसके रसूल का है। तुम्हारा काम केवल मान लेना और आज्ञापालन करना है। अतः (ऐ मोमिनो!) तुम अल्लाह से, उसके आदेशों का पालन करके और उसकी मना की हुई बातों से दूर रहकर, डरो। तथा तुम्हारे बीच जो संबंध-विच्छेद और वियोग है, उसे आपसी प्रेम, परस्पर संपर्क (संयोग), अच्छे शिष्टाचार और क्षमा के द्वारा सुधार लो। और अगर तुम सच में ईमान वाले हो, तो अल्लाह और उसके रसूल की आज्ञा का पालन करो। क्योंकि ईमान आज्ञापालन करने और गुनाहों से दूर रहने की प्रेरणा देता है। यह प्रश्न बद्र के युद्ध के बाद किया गया था।