يَٰٓأَيُّهَا ٱلنَّبِيُّ إِنَّآ أَحۡلَلۡنَا لَكَ أَزۡوَٰجَكَ ٱلَّٰتِيٓ ءَاتَيۡتَ أُجُورَهُنَّ وَمَا مَلَكَتۡ يَمِينُكَ مِمَّآ أَفَآءَ ٱللَّهُ عَلَيۡكَ وَبَنَاتِ عَمِّكَ وَبَنَاتِ عَمَّٰتِكَ وَبَنَاتِ خَالِكَ وَبَنَاتِ خَٰلَٰتِكَ ٱلَّٰتِي هَاجَرۡنَ مَعَكَ وَٱمۡرَأَةٗ مُّؤۡمِنَةً إِن وَهَبَتۡ نَفۡسَهَا لِلنَّبِيِّ إِنۡ أَرَادَ ٱلنَّبِيُّ أَن يَسۡتَنكِحَهَا خَالِصَةٗ لَّكَ مِن دُونِ ٱلۡمُؤۡمِنِينَۗ قَدۡ عَلِمۡنَا مَا فَرَضۡنَا عَلَيۡهِمۡ فِيٓ أَزۡوَٰجِهِمۡ وَمَا مَلَكَتۡ أَيۡمَٰنُهُمۡ لِكَيۡلَا يَكُونَ عَلَيۡكَ حَرَجٞۗ وَكَانَ ٱللَّهُ غَفُورٗا رَّحِيمٗا ٥٠
ऐ नबी! निःसंदेह हमने आपके लिए आपकी वे पत्नियाँ हलाल (वैध) कर दी हैं, जिन्हें आपने उनका महर चुका दिया है, तथा वे लौंडियाँ (भी) जो आपके स्वामित्व में हैं, उन लौंडियों में से जो अल्लाह ने ग़नीमत के धन से आपको36 प्रदान की हैं। तथा आपके चाचा की बेटियाँ, आपकी फूफियों की बेटियाँ, आपके मामा की बेटियाँ और आपकी मौसियों की बेटियाँ, जिन्होंने आपके साथ हिजरत की है। तथा वह ईमान वाली महिला भी, जो स्वयं को नबी के लिए दान कर दे, यदि नबी उससे विवाह करना चाहे। यह विशेष रूप से आपके लिए है, अन्य ईमान वालों के लिए नहीं। निश्चय ही हम जानते हैं जो कुछ हमने उनपर उनकी पत्नियों तथा उनके स्वामित्व में आई हुई दासियों के संबंध37 में फ़र्ज़ किया है; ताकि तुमपर कोई तंगी न रहे। और अल्लाह बहुत क्षमा करने वाला, अत्यंत दयालु है।
फ़ुटनोट
36 अर्थात वह दासियाँ जो युद्ध में आप के हाथ आई हों।
37 अर्थात यह कि चार पत्नियों से अधिक न रखो तथा महर और विवाह के समय दो साक्षी बनाना और दासियों के लिए चार का प्रतिबंध न होना एवं सबका भरण-पोषण और सबके साथ अच्छा व्यवहार करना इत्यादि।
तफ़सीर
ऐ नबी! हमने आपके लिए आपकी उन पत्नियों को वैध कर दिया है, जिन्हें आपने उनका महर चुका दिया है। तथा हमने आपके लिए उन दासियों को भी हलाल किया है, जो आपके स्वामित्व में हैं, जो अल्लाह ने आपको बंदी औरतों में से प्रदान की हैं। और हमने आपके लिए हलाल किया है आपके चाचा की बेटियों के साथ विवाह, आपकी फूफियों की बेटियों के साथ विवाह, आपके मामा की बेटियों के साथ विवाह और आपकी मौसियों की बेटियों के साथ विवाह, जो आपके साथ मक्का से मदीना की ओर हिजरत करके आई हैं। तथा हमने आपके लिए उस ईमान वाली महिला से भी विवाह करना हलाल किया है जो बिना महर के स्वयं को आपको भेंट कर दे, यदि आप उससे निकाह करना चाहें। और हिबा (अनुदान) का विवाह केवल आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के लिए विशिष्ट है, आपके अलावा उम्मत के किसी अन्य व्यक्ति के लिए जायज़ नहीं है। हमें जानते हैं जो कुछ हमने ईमान वालों पर उनकी पत्नियों के संबंध में अनिवार्य किया है कि उनके लिए चार स्त्रियों की सीमा पार करना वैध नहीं है। तथा हम वह भी जानते हैं जो हमने उनकी दासियों के संबंध में उनके लिए धर्मसंगत किया है कि उनके लिए किसी संख्या के प्रतिबंध के बिना उनमें से जितनी से चाहें, लाभ उठाने का अधिकार हैं। हमने उल्लिखित चीज़ों में से आपके लिए जो कुछ वैध किया है, जो हमने आपके अलावा के लिए अनुमेय नहीं किया; यह इसलिए है ताकि आपपर कोई तंगी और कष्ट न रहे। और अल्लाह अपने तौबा करने वाले बंदों को बहुत क्षमा करने वाला, उनपर अत्यंत दयालु है।