सूरह Yunus, आयत 16

10:16

قُل لَّوۡ شَآءَ ٱللَّهُ مَا تَلَوۡتُهُۥ عَلَيۡكُمۡ وَلَآ أَدۡرَىٰكُم بِهِۦۖ فَقَدۡ لَبِثۡتُ فِيكُمۡ عُمُرٗا مِّن قَبۡلِهِۦٓۚ أَفَلَا تَعۡقِلُونَ ١٦

आप कह दें : यदि अल्लाह चाहता, तो मैं तुम्हें इसे पढ़कर न सुनाता और न वह तुम्हें इसकी ख़बर देता। फिर निःसंदेह मैं इससे पहले तुम्हारे बीच जीवन की एक अवधि व्यतीत कर चुका हूँ। तो क्या तुम नहीं समझतेॽ4

फ़ुटनोट

4 आयत का भावार्थ यह है कि यदि तुम एक इसी बात पर विचार करो कि मैं तुम्हारे लिए कोई अपरिचित, अज्ञात नहीं हूँ। मैं तुम्ही में से हूँ। यहीं मक्का में पैदा हुआ, और चालीस वर्ष की आयु तुम्हारे बीच व्यतीत की। मेरा पूरा जीवन चरित्र तुम्हारे सामने है, इस अवधि में तुमने सत्य और अमानत के विरुद्ध मुझ में कोई बात नहीं देखी, तो अब चालीस वर्ष के पश्चात् यह कैसे हो सकता है कि अल्लाह पर यह मिथ्या आरोप लगा दूँ कि उसने यह क़ुरआन मुझपर उतारा है? मेरा पवित्र जीवन स्वयं इस बात का प्रमाण है कि यह क़ुरआन अल्लाह की वाणी है। और मैं उसका नबी हूँ। और उसी की अनुमति से यह क़ुरआन तुम्हें सुना रहा हूँ।

तफ़सीर

(ऐ रसूल!) आप कह दें : यदि अल्लाह चाहता कि मैं तुम्हें क़ुरआन पढ़कर न सुनाऊँ, तो मैं तुम्हें क़ुरआन पढ़कर न सुनाता और इसे तुम तक न पहुँचाता। तथा यदि अल्लाह चाहता, तो तुम्हें मेरी ज़ुबानी क़ुरआन से सूचित न करता। फिर मैं तुम्हारे बीच जीवन की एक लंबी अवधि (चालीस वर्ष) व्यतीत कर चुका हूँ। न मैं पढ़ना जानता था और न लिखना। मैं इस तरह की किसी चीज़ की खोज और तलाश में भी नहीं था। तो क्या तुम अपनी बुद्धि से यह नहीं जानते कि जो कुछ मैं तुम्हारे पास लेकर आया हूँ वह अल्लाह की ओर से है, और उसमें मेरा कोई दख़ल नहीं है?!