إِذۡ تَمۡشِيٓ أُخۡتُكَ فَتَقُولُ هَلۡ أَدُلُّكُمۡ عَلَىٰ مَن يَكۡفُلُهُۥۖ فَرَجَعۡنَٰكَ إِلَىٰٓ أُمِّكَ كَيۡ تَقَرَّ عَيۡنُهَا وَلَا تَحۡزَنَۚ وَقَتَلۡتَ نَفۡسٗا فَنَجَّيۡنَٰكَ مِنَ ٱلۡغَمِّ وَفَتَنَّٰكَ فُتُونٗاۚ فَلَبِثۡتَ سِنِينَ فِيٓ أَهۡلِ مَدۡيَنَ ثُمَّ جِئۡتَ عَلَىٰ قَدَرٖ يَٰمُوسَىٰ ٤٠
जब तेरी बहन10 चल रही थी और कह रही थी : क्या मैं तुम्हें उसका पता बता दूँ, जो इसका पालन-पोषण करे? फिर हमने तुझे तेरी माँ के पास लौटा दिया, ताकि उसकी आँख ठंडी हो और वह शोक न करे। तथा तूने एक आदमी को मार डाला11, तो हमने तुझे दुःखसे बचा लिया और हमने तुम्हारी अच्छी तरह से परीक्षा ली। फिर तू कई वर्ष मदयन वालों के बीच ठहरा रहा, फिर तू एक निश्चित अनुमान पर आया, ऐ मूसा!
फ़ुटनोट
10 अर्थात संदूक़ के पीछे नदी के किनारे।
11 अर्थात एक फ़िरऔनी को मारा और वह मर गया, तो तुम मदयन चले गए, इसका वर्णन सूरतुल-क़स़स़ में आएगा।
तफ़सीर
जब तेरी बहन चलने लगी, जहाँ-जहाँ ताबूत (संदूक़) जा रहा था वह उसका पीछा कर रही थी। फिर उसने ताबूत को उठाने वालों से कहा : क्या मैं उसकी तरफ तुम्हारी रहनुमाई करूँ जो इसकी रक्षा करे, इसे दूध पिलाए और इसका पालन-पोषण करेॽ इस प्रकार हमने तुम्हें तुम्हारी माँ के पास वापस पहुँचाकर तुमपर उपकार किया, ताकि वह तुम्हें अपने पास वापस पाकर खुश हो जाए और तुम्हारी वजह से शोक न करे। तथा तुमने उस “क़िब्ती” को क़त्ल कर दिया, जिसे तुमने घूँसा मारा था, तो हमने तुम्हें दंड से बचा लिया। इसी तरह हमने एक के बाद एक तुम्हें हर परीक्षा से बचाया, जिससे तुम ग्रस्त हुए। फिर तू वहाँ से निकलकर वर्षों तक मदयन के लोगों में ठहरा रहा। फिर तू उस समय आया, जब ऐ मूसा! तुझसे बात करने के लिए तेरा आना नियत था।