أَوَلَمۡ يَعۡلَمُوٓاْ أَنَّ ٱللَّهَ يَبۡسُطُ ٱلرِّزۡقَ لِمَن يَشَآءُ وَيَقۡدِرُۚ إِنَّ فِي ذَٰلِكَ لَأٓيَٰتٖ لِّقَوۡمٖ يُؤۡمِنُونَ ٥٢
क्या उन्हें मालूम नहीं कि अल्लाह जिसके लिए चाहता है, रोज़ी कुशादा कर देता है, और (जिसे चाहता है) नापकर देता है? निश्चय इसमें बहुत-सी निशानियाँ हैं, उन लोगों के लिए, जो ईमान लाते हैं।
तफ़सीर
क्या इन मुश्रिकों ने यह बात कहते समय इस तथ्य को ध्यान में नहीं रखा कि अल्लाह जिसके लिए चाहता है, रोज़ी को फैला देता है, यह आज़माने के लिए कि वह शुक्र करता है या नाशुक्री?! और जिसके लिए चाहता है, रोज़ी को तंग कर देता है, यह जानने के लिए कि वह सब्र करता है या अल्लाह के निर्णय पर नाराज़गी जताता है?! निश्चित रूप से इस रोज़ी को फैलाने और तंग करने में, उन लोगों के लिए बहुत-से निर्देश हैं, जो ईमान रखते हैं, क्योंकि वही निर्देशों का लाभ उठाते हैं। रही बात काफ़िरों की, तो वे उनसे मुँह फेरकर गुज़र जाते हैं।