وَلَوۡ أَنَّهُمۡ رَضُواْ مَآ ءَاتَىٰهُمُ ٱللَّهُ وَرَسُولُهُۥ وَقَالُواْ حَسۡبُنَا ٱللَّهُ سَيُؤۡتِينَا ٱللَّهُ مِن فَضۡلِهِۦ وَرَسُولُهُۥٓ إِنَّآ إِلَى ٱللَّهِ رَٰغِبُونَ ٥٩
और (कितना अच्छा होता) यदि वे उससे संतुष्ट हो जाते, जो अल्लाह और उसके रसूल ने उन्हें दिया और कहते कि हमारे लिए अल्लाह काफ़ी है। जल्द ही अल्लाह हमें अपनी कृपा से प्रदान करेगा तथा उसका रसूल भी। निःसंदेह हम अल्लाह ही की ओर रूचि रखने वाले हैं।
तफ़सीर
यदि ये मुनाफ़िक़, जो सदक़ों के विभाजन के बारे में आपकी आलोचना करते हैं, उससे संतुष्ट होते, जो अल्लाह ने उनके लिए नियत किया है और जो उसके रसूल ने उन्हें उनमें से दिया है, तथा वे कहते : अल्लाह हमारे लिए पर्याप्त है, अल्लाह हमें अपने अनुग्रह से जो चाहे, देगा और उसके रसूल भी हमें अल्लाह की दी हुई चीज़ों में से प्रदान करेंगे। हम केवल अल्लाह ही से आशा रखते हैं कि वह हमें अपने अनुग्रह से प्रदान करे। यदि उन्होंने ऐसा किया होता, तो यह उनके लिए आपकी आलोचना करने से बेहतर होता।