لَقَدۡ نَصَرَكُمُ ٱللَّهُ فِي مَوَاطِنَ كَثِيرَةٖ وَيَوۡمَ حُنَيۡنٍ إِذۡ أَعۡجَبَتۡكُمۡ كَثۡرَتُكُمۡ فَلَمۡ تُغۡنِ عَنكُمۡ شَيۡـٔٗا وَضَاقَتۡ عَلَيۡكُمُ ٱلۡأَرۡضُ بِمَا رَحُبَتۡ ثُمَّ وَلَّيۡتُم مُّدۡبِرِينَ ٢٥
निःसंदेह अल्लाह ने बहुत-से स्थानों पर तुम्हारी सहायता की तथा हुनैन7 के दिन भी, जब तुम्हारी बहुतायत ने तुम्हें आत्ममुग्ध बना दिया, फिर वह तुम्हारे कुछ काम न आई तथा तुमपर धरती अपने विस्तार के उपरांत तंग हो गई, फिर तुम पीठ फेरते हुए लौट गए।
फ़ुटनोट
7 "ह़ुनैन" मक्का तथा ताइफ़ के बीच एक वादी है। वहीं पर यह युद्ध सन् 8 हिजरी में मक्का की विजय के पश्चात् हुआ। आपको मक्का में यह सूचना मिली के हवाज़िन और सक़ीफ़ के क़बीले मक्का पर आक्रमण करने की तैयारियाँ कर रहे हैं। जिसपर आप बारह हज़ार की सेना लेकर निकले। जबकि शत्रु की संख्या केवल चार हज़ार थी। फिर भी उन्होंने अपनी तीरों से मुसलमानों का मुँह फेर दिया। नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम और आपके कुछ साथी रणक्षेत्र में डटे रहे। अंततः फिर इस्लामी सेना ने व्यवस्थित होकर विजय प्राप्त की। (इब्ने कसीर)
तफ़सीर
निःसंदेह अल्लाह ने बहुत-से युद्धों में (ऐ ईमान वालो!) तुम्हारी कम संख्या और कमज़ोर तैयारी के बावजूद तुम्हारे दुश्मन बहुदेववादियों के खिलाफ तुम्हारी मदद की, जब तुमने अल्लाह पर भरोसा किया और साधनों को अपनाया, तथा अपनी अधिक संख्या पर आत्ममुग्ध नहीं हुए। क्योंकि अधिक संख्या, उनपर तुम्हारी जीत का कारण नहीं थी। तथा हुनैन के दिन भी तुम्हारी मदद की, जब तुम अपनी अधिक संख्या पर आत्ममुग्ध हो गए और कहने लगे : आज हम कम संख्या के कारण नहीं हारेंगे। पर तुम्हारी अधिक संख्या तुम्हारे कुछ काम न आई, जिसपर तुम आत्ममुग्ध थे। चुनाँचे तुम्हारा दुश्मन तुमपर हावी हो गया और धरती अपने विस्तार के बावजूद तुमपर तंग हो गई, फिर तुम अपने शत्रुओं से हारकर भाग खड़े हुए।