सूरह An-Nahl, आयत 28

16:28

ٱلَّذِينَ تَتَوَفَّىٰهُمُ ٱلۡمَلَٰٓئِكَةُ ظَالِمِيٓ أَنفُسِهِمۡۖ فَأَلۡقَوُاْ ٱلسَّلَمَ مَا كُنَّا نَعۡمَلُ مِن سُوٓءِۭۚ بَلَىٰٓۚ إِنَّ ٱللَّهَ عَلِيمُۢ بِمَا كُنتُمۡ تَعۡمَلُونَ ٢٨

जिनके प्राण फ़रिश्ते इस हाल में निकालते हैं कि वे अपने ऊपर अत्याचार करने वाले होते हैं, तो वे (मौत देखकर) आज्ञाकारी बन जाते10 हैं, (और कहते हैं कि) हम कोई बुरा काम नहीं किया करते थे। क्यों नहीं? निश्चय अल्लाह भली-भाँति जानने वाला है, जो तुम किया करते थे।

फ़ुटनोट

10 अर्थात मरण के समय अल्लाह को मान लेते हैं।

तफ़सीर

मौत का फ़रिश्ता और उसके सहयोगी जिन लोगों की रूह़ इस हाल में निकालते हैं कि वे अल्लाह का इनकार करके स्वयं पर अत्याचार करने वाले होते हैं, तो वे मौत को अपने सामने देखकर आत्मसमर्पण कर देते हैं और अपने कुफ़्र तथा पाप का इनकार कर देते हैं, यह सोचकर कि इनकार करने से उन्हें फायदा होगा। तो इसपर उनसे कहा जाता है : तुम झूठ कहते हो। निश्चय तुम पाप करने वाले काफ़िर थे। तुम दुनिया में जो कुछ किया करते थे, अल्लाह उसे खूब जानता है। उसमें से कुछ भी उससे छिपा नहीं है और वह तुम्हें उसका बदला प्रदान करेगा।