सूरह Al-Imran, आयत 19

3:19

إِنَّ ٱلدِّينَ عِندَ ٱللَّهِ ٱلۡإِسۡلَٰمُۗ وَمَا ٱخۡتَلَفَ ٱلَّذِينَ أُوتُواْ ٱلۡكِتَٰبَ إِلَّا مِنۢ بَعۡدِ مَا جَآءَهُمُ ٱلۡعِلۡمُ بَغۡيَۢا بَيۡنَهُمۡۗ وَمَن يَكۡفُرۡ بِـَٔايَٰتِ ٱللَّهِ فَإِنَّ ٱللَّهَ سَرِيعُ ٱلۡحِسَابِ ١٩

निःसंदेह दीन (धर्म) अल्लाह के निकट इस्लाम ही है और किताब वालों ने अपने पास ज्ञान आ जाने के पश्चात आपस में ईर्ष्या के कारण ही मतभेद किया। तथा जो अल्लाह की आयतों का इनकार करे, तो निःसंदेह अल्लाह बहुत जल्द ह़िसाब लेने वाला है।

तफ़सीर

नि:संदेह अल्लाह के निकट स्वीकार्य धर्म इस्लाम है। इस्लाम का मतलब है आज्ञाकारिता के साथ अकेले अल्लाह के प्रति अधीनता और उपासना (बंदगी) के साथ उसके प्रति समर्पण; तथा सभी रसूलों पर उनकी अंतिम कड़ी मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम तक ईमान लाना, जिनपर अल्लाह ने रसूलों का सिलसिला समाप्त कर दिया। अतः अल्लाह आपकी शरीयत के अलावा कुछ भी स्वीकार नहीं करेगा। यहूदियों और ईसाइयों ने अपने धर्म के बारे में जो भी मतभेद किया और विभिन्न समूहों और दलों में विभाजित हो गए, वह उनके पास ज्ञान आने के साथ उनपर तर्क स्थापित होने के बाद, ईर्ष्या और दुनिया की लालच के कारण था। तथा जो अल्लाह की उसके रसूल पर अवतरित आयतों का इनकार करे, तो निःसंदेह अल्लाह उससे बहुत जल्द हिसाब लेने वाला है, जिसने उसका इनकार किया और उसके रसूलों को झुठलाया।