وَظَلَّلۡنَا عَلَيۡكُمُ ٱلۡغَمَامَ وَأَنزَلۡنَا عَلَيۡكُمُ ٱلۡمَنَّ وَٱلسَّلۡوَىٰۖ كُلُواْ مِن طَيِّبَٰتِ مَا رَزَقۡنَٰكُمۡۚ وَمَا ظَلَمُونَا وَلَٰكِن كَانُوٓاْ أَنفُسَهُمۡ يَظۡلِمُونَ ٥٧
और हमने तुमपर बादलों की छाया28 की, तथा हमने तुमपर 'मन्न'29 और 'सलवा' उतारा, (और तुमसे कहा :) उन अच्छी पाक चीज़ों में से खाओ, जो हमने तुम्हें प्रदान की हैं। और उन्होंने हमपर अत्याचार नहीं किया, परंतु वे अपने आप ही पर अत्याचार किया करते थे।
फ़ुटनोट
28 अधिकांश भाष्यकारों ने इसे "तीह" के क्षेत्र से संबंधित माना है। (देखिए : तफ़्सीर क़ुर्तुबी)
29 भाष्यकारों ने लिखा है कि "मन्न" एक प्रकार का अति मीठा स्वादिष्ट गोंद था, जो ओस के समान रात्रि के समय आकाश से गिरता था। तथा "सलवा" एक प्रकार के पक्षी थे, जो संध्या के समय सीनै के पास हज़ारों की संख्या में एकत्र हो जाते, जिन्हें बनी इसराईल पकड़ कर खाते थे।
तफ़सीर
तुमपर हमारी एक कृपा यह है कि जब तुम धरती में भटक रहे थे, तो हमने तुम्हें सूर्य की गर्मी से छाया देने के लिए बादलों को भेजा। इसी तरह हमने अपनी नेमतों में से तुमपर शहद की तरह एक मीठा पेय, तथा बटेर के सदृश अच्छे माँस वाला एक छोटा पक्षी उतारा, और हमने तुमसे कहा : उन अच्छी चीजों में से खाओ जो हमने तुम्हें प्रदान की हैं। उन्होंने इन नेमतों का इनकार और उनकी नाशुक्री करके हमारा कुछ नुक़सान नहीं किया, बल्कि उन्होंने अपने हिस्से का सवाब कम करके और अपने आपको दंड से दो चार करके ख़ुद पर अत्याचार किया।