सूरह Al-Baqarah, आयत 254

2:254

يَٰٓأَيُّهَا ٱلَّذِينَ ءَامَنُوٓاْ أَنفِقُواْ مِمَّا رَزَقۡنَٰكُم مِّن قَبۡلِ أَن يَأۡتِيَ يَوۡمٞ لَّا بَيۡعٞ فِيهِ وَلَا خُلَّةٞ وَلَا شَفَٰعَةٞۗ وَٱلۡكَٰفِرُونَ هُمُ ٱلظَّٰلِمُونَ ٢٥٤

ऐ ईमान वालो! उसमें से ख़र्च करो, जो हमने तुम्हें दिया है, इससे पहले कि वह दिन आ जाए, जिसमें न कोई क्रय-विक्रय होगा और न कोई दोस्ती और न कोई अनुशंसा (सिफ़ारिश)। तथा काफ़िर लोग168 ही अत्याचारी169 हैं।

फ़ुटनोट

168 अर्थात जो इस तथ्य को नहीं मानते वही स्वयं को हानि पहुँचा रहे हैं।

169 आयत का भावार्थ यह है कि परलोक की मुक्ति ईमान और सत्कर्म पर निर्भर है, न वहाँ मुक्ति का सौदा होगा न मैत्री और सिफ़ारिश काम आएगी।

तफ़सीर

ऐ अल्लाह पर ईमान लाने और उसके रसूल का अनुसरण करने वालो! हमने तुम्हें विभिन्न हलाल (वैध) धन में से जो कुछ प्रदान किया है, उसमें से खर्च करो, इससे पहले कि क़ियामत का दिन आ जाए। उस समय, वहाँ न कोई क्रय-विक्रय होगा कि जिससे मनुष्य वह चीज़ प्राप्त कर सके जो उसे लाभ दे, न कोई दोस्ती होगी जो उसे संकट के समय में लाभ दे, और न ही कोई मध्यस्थता (सिफ़ारिश) होगी जो हानि को दूर करे या लाभ पहुँचाए। सिवाय इसके कि जब अल्लाह जिसे चाहे और जिससे वह प्रसन्न हो, अनुमति प्रदान कर दे। और काफ़िर लोग ही वास्तव में अत्याचारी हैं क्योंकि वे सर्वशक्तिमान अल्लाह का इनकार करते हैं।