ذَٰلِكَ هُدَى ٱللَّهِ يَهۡدِي بِهِۦ مَن يَشَآءُ مِنۡ عِبَادِهِۦۚ وَلَوۡ أَشۡرَكُواْ لَحَبِطَ عَنۡهُم مَّا كَانُواْ يَعۡمَلُونَ ٨٨
यह अल्लाह का मार्गदर्शन है, जिसपर वह अपने बंदों में से जिसे चाहता है, चलाता है। और यदि ये लोग शिर्क करते, तो निश्चय उनसे वह सब नष्ट हो जाता जो वे किया करते थे।59
फ़ुटनोट
59 इन आयतों में अठारह नबियों की चर्चा करने के पश्चात् यह कहा गया है कि यदि ये सब भी शिर्क करते, तो इनके सत्कर्म व्यर्थ हो जाते। जिससे अभिप्राय शिर्क की गंभीरता से सावधान करना है।
तफ़सीर
यह तौफ़ीक़ (सफलता) जो उन्हें प्राप्त हुई, यह अल्लाह की तौफ़ीक़ है। वह अपने बंदों में से जिसे चाहता है तौफ़ीक़ देता है। और यदि ये लोग अल्लाह के साथ उसके अलावा को साझी बनाते, तो उनका कार्य व्यर्थ (अमान्य) हो जाता; क्योंकि शिर्क नेक कार्य को नष्ट (अमान्य) कर देने वाला है।