सूरह Az-Zukhruf, आयत 86

43:86

وَلَا يَمۡلِكُ ٱلَّذِينَ يَدۡعُونَ مِن دُونِهِ ٱلشَّفَٰعَةَ إِلَّا مَن شَهِدَ بِٱلۡحَقِّ وَهُمۡ يَعۡلَمُونَ ٨٦

तथा वे लोग जिन्हें ये उसके सिवा पुकारते हैं, वे सिफ़ारिश का अधिकार नहीं रखते। परंतु जिसने सत्य22 की गवाही दी और वे (उसे) जानते हों।

फ़ुटनोट

22 सत्य से अभिप्राय धर्म-सूत्र "ला इलाहा इल्लल्लाह" है। अर्थात जो इसे जान-बूझ कर स्वीकार करते हों, तो शफ़ाअत उन्हीं के लिए होगी। उन काफ़िरों के लिए नहीं, जो मूर्तियों को पुकारते हैं। अथवा इससे अभिप्राय यह है कि सिफ़ारिश का अधिकार उनको मिलेगा जिन्होंने सत्य को स्वीकार किया है। जैसे नबियों, फ़रिश्तों तथा सदाचारियों को, न कि उन झूठे पूज्यों को जिन्हें मुश्रिक अपना सिफ़ारिशी समझते हैं।

तफ़सीर

और वे लोग, जिन्हें ये मुश्रिक अल्लाह को छोड़कर पूजते हैं, अल्लाह के निकट सिफ़ारिश का अधिकार नहीं रखते। अधिकार केवल वही रखता है, जो इस बात की गवाही दे कि अल्लाह के सिवा कोई सत्य पूज्य नहीं और वह उस बात को जानता हो, जिसकी उसने गवाही दी है; जैसे कि ईसा, उज़ैर और फ़रिश्ते।