सूरह An-Nisa, आयत 65

4:65

فَلَا وَرَبِّكَ لَا يُؤۡمِنُونَ حَتَّىٰ يُحَكِّمُوكَ فِيمَا شَجَرَ بَيۡنَهُمۡ ثُمَّ لَا يَجِدُواْ فِيٓ أَنفُسِهِمۡ حَرَجٗا مِّمَّا قَضَيۡتَ وَيُسَلِّمُواْ تَسۡلِيمٗا ٦٥

तो (ऐ नबी!) आपके पालनहार की क़सम! वे कभी ईमान वाले नहीं हो सकते, जब तक अपने आपस के विवाद में आपको निर्णायक47 न बनाएँ, फिर आप जो निर्णय कर दें, उससे अपने दिलों में तनिक भी तंगी महसूस न करें और उसे पूरी तरह से स्वीकार कर लें।

फ़ुटनोट

47 यह आदेश आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के जीवन में था। तथा आपके निधन के पश्चात् अब आपकी सुन्नत से निर्णय लेना है।

तफ़सीर

अतः मामला ऐसा नहीं है जैसा कि ये पाखंडी लोग दावा करते हैं। फिर अल्लाह ने अपने अस्तित्व की क़सम खाकर फरमाया कि वे सच्चे मोमिन नहीं हो सकते, जब तक कि वे अपने बीच उत्पन्न होने वाले समस्त मतभेदों में रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के जीवन काल में रसूल के पास और आपकी मृत्यु के बाद आपकी शरीयत की ओर निर्णय के लिए न जाएँ। फिर वे रसूल के फैसले से संतुष्ट हो जाएँ और उनके दिलों में आपके निर्णय के संबंध में कोई तंगी और संदेह न हो और परोक्ष एवं प्रत्यक्ष रूप से उसे पूरी तरह से स्वीकार कर लें।