هُمُ ٱلَّذِينَ كَفَرُواْ وَصَدُّوكُمۡ عَنِ ٱلۡمَسۡجِدِ ٱلۡحَرَامِ وَٱلۡهَدۡيَ مَعۡكُوفًا أَن يَبۡلُغَ مَحِلَّهُۥۚ وَلَوۡلَا رِجَالٞ مُّؤۡمِنُونَ وَنِسَآءٞ مُّؤۡمِنَٰتٞ لَّمۡ تَعۡلَمُوهُمۡ أَن تَطَـُٔوهُمۡ فَتُصِيبَكُم مِّنۡهُم مَّعَرَّةُۢ بِغَيۡرِ عِلۡمٖۖ لِّيُدۡخِلَ ٱللَّهُ فِي رَحۡمَتِهِۦ مَن يَشَآءُۚ لَوۡ تَزَيَّلُواْ لَعَذَّبۡنَا ٱلَّذِينَ كَفَرُواْ مِنۡهُمۡ عَذَابًا أَلِيمًا ٢٥
ये वही लोग हैं, जिन्होंने कुफ़्र किया और तुम्हें मस्जिदे-ह़राम से रोका तथा क़ुर्बानी के बंधे हुए जानवरों को भी इससे रोका कि वे अपने ज़बह होने के स्थान पर पहुँचें। और यदि यह बात न होती कि तुम कुछ मुसलमान पुरुषों तथा कुछ मुसलमान स्त्रियों को, जिन्हें तुम नहीं जानते, रौंद डालोगे, तो तुमपर अनजाने में उनके कारण दोष आ जाएगा13 (तो उनपर आक्रमण कर दिया जाता); ताकि अल्लाह जिसे चाहे, अपनी दया में दाख़िल करे। यदि वे (मुसलमान एवं काफ़िर) अलग-अगल हो गए होते, तो हम अवश्य उनमें से कुफ़्र करने वालों को दर्दनाक यातना देते।
फ़ुटनोट
13 अर्थात यदि ह़ुदैबिया के अवसर पर संधि न होती और युद्ध हो जाता, तो अनजाने में मक्का में कई मुसलमान भी मारे जाते जो अपना ईमान छिपाए हुए थे और हिज्रत नहीं कर सके थे। फिर तुमपर दोष आ जाता कि तुम एक ओर इस्लाम का संदेश देते हो, तथा दूसरी ओर स्वयं मुसलमानों को मार रहे हो।
तफ़सीर
ये वही लोग हैं जिन्होंने अल्लाह और उसके रसूल का इनकार किया, तुम्हें मस्जिद-ए-हराम से रोका और क़ुर्बानी के जानवरों को रोका, इस हाल में कि वे अपने ज़बह के स्थान हरम तक पहुँचने से रोके हुए थे। यदि वहाँ कुछ अल्लाह पर ईमान रखने वाले पुरुषों और उसपर ईमान रखने वाली स्त्रियाँ मौजूद न होतीं, जिन्हें तुम नहीं जानते, तो तुम उन्हें काफ़िरों के साथ क़त्ल कर देते, फिर तुम्हें उन्हें अनजाने में क़त्ल करने से पाप लगता और खून बहा देना पड़ता; तो तुम्हें मक्का पर चढ़ाई करने की अनुमति दे दी जाती, ताकि अल्लाह जिसे चाहे अपनी रहमत में दाखिल कर दे, जैसे मक्का के ईमान वाले लोग। अगर मक्का में काफ़िर लोग मोमिनों से अलग होते, तो हम उन लोगों को दर्दनाक यातना देते, जिन्होंने अल्लाह और उसके रसूल का इनकार किया।